
कानपुर में दशहरे की तैयारी तेज (IMG: Dynamite News)
Kanpur News: असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक विजयादशमी पर्व को लेकर कानपुर में तैयारियां तेज हो गई हैं। शहर के कैंट स्थित रामलीला मैदान में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों को तैयार करने का काम जोर-शोर से चल रहा है। इन पुतलों को बनाने की जिम्मेदारी संभाल रहे कारीगरों के लिए यह सिर्फ रोजी-रोटी का काम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक खास कारीगरी है। इकबाल का परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से दशहरे के लिए रावण और अन्य पुतले तैयार करता आ रहा है।
कैंट स्थित रामलीला मैदान में पुतलों को अंतिम रूप देने में जुटे कारीगर इकबाल बताते हैं कि उनके परिवार में दशहरे के पुतले बनाने का काम करीब तीन पीढ़ियों से चला आ रहा है। परिवार के लोग मिलकर इस काम को पूरा करते हैं और हर साल दशहरे के पर्व का उन्हें इंतजार रहता है। इकबाल के मुताबिक, समय के साथ पुतलों की बनावट और उन्हें तैयार करने के तरीके में बदलाव आया है, लेकिन परिवार की यह परंपरागत कारीगरी आज भी जारी है।
बड़े आकार के पुतलों को तैयार करने में काफी समय लगता है। यही वजह है कि इस बार भी पुतले बनाने का काम करीब तीन महीने पहले ही शुरू कर दिया गया था। पहले बांस का ढांचा तैयार किया जाता है और इसके बाद उस पर अलग-अलग सामग्री लगाकर पुतले का आकार दिया जाता है। इसके बाद रंगीन कागज और दूसरी सामग्री से पुतलों की सजावट की जाती है। पुतलों को आकर्षक रूप देने के लिए उनकी फिनिशिंग पर भी खास ध्यान दिया जाता है।
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इस बार तैयार किए जा रहे पुतलों का आकार भी खास है। रामलीला मैदान के लिए 70 फीट ऊंचे रावण का पुतला बनाया जा रहा है। वहीं कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों की ऊंचाई करीब 50-50 फीट रखी गई है। कारीगरों के मुताबिक पुतलों में इस तरह की विशेष व्यवस्था की जा रही है कि दशहरे के दिन लोगों को उनका रूप और प्रदर्शन आकर्षित करे।
कानपुर में तैयार होने वाले इन पुतलों की मांग आसपास के क्षेत्रों में भी रहती है। इकबाल के मुताबिक उनके परिवार द्वारा तैयार किए गए रावण के पुतले कानपुर शहर के अलावा कानपुर देहात और अन्य जिलों में भी भेजे जाते हैं। दशहरे के नजदीक आते ही पुतलों की मांग बढ़ने लगती है। अलग-अलग रामलीला समितियां अपनी जरूरत के हिसाब से पुतलों का आकार और डिजाइन तय कराती हैं। बड़े पुतलों को तैयार करने में ज्यादा समय और मेहनत लगती है, इसलिए कारीगरों को महीनों पहले से तैयारी शुरू करनी पड़ती है।
पुतला बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की कीमतों में भी इस बार कुछ बढ़ोतरी हुई है। कारीगरों के अनुसार बांस, रंगीन कागज, अन्य जरूरी सामान के साथ-साथ पुतलों को लाने-ले जाने का किराया भी पहले की तुलना में बढ़ा है। इसका असर पुतलों की लागत पर पड़ना स्वाभाविक है। इसके बावजूद इकबाल का परिवार अपनी पीढ़ियों पुरानी कारीगरी को पूरी मेहनत से निभा रहा है। कारीगरों का कहना है कि जब दशहरे के दिन महीनों की मेहनत से तैयार किए गए पुतले मैदान में खड़े होते हैं और हजारों लोग उन्हें देखने पहुंचते हैं, तो उनकी मेहनत सफल महसूस होती है।
दशहरे के पुतले तैयार करना इकबाल के परिवार के लिए तीन पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है। बांस, कागज और रंगों से तैयार होने वाला यह काम कई दिनों की मेहनत और कारीगरी मांगता है। विजयादशमी के दिन जब रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन होगा, तब इनके पीछे काम करने वाले कारीगरों की महीनों की मेहनत भी सामने होगी।
Location : Kanpur
Published : 5 October 2026, 2:41 PM IST