दो-चार हजार की कमाई, सात दशक की मेहनत; गोरखपुर के इस दंपती की दीपावली की कहानी भावुक कर देगी!

गोरखपुर के रामपुर गांव के रामजियावन कुम्हार और उनकी पत्नी गिरजा देवी पिछले करीब 70 वर्षों से मिट्टी के दीये और बर्तन बना रहे हैं। आधुनिक झालरों के बढ़ते चलन और कम आमदनी के बावजूद बुजुर्ग दंपती ने अपना पुश्तैनी काम नहीं छोड़ा है। पैर में चोट के बावजूद गिरजा देवी पति के साथ परंपरा की लौ जलाए हुए हैं।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 3 November 2026, 3:08 PM IST

Gorakhpur: बाजारों में बिजली की रंग-बिरंगी झालरों और विदेशी लाइटों की चमक बढ़ रही है। दीपावली की सजावट में आधुनिक उपकरणों ने मिट्टी के पारंपरिक दीयों की जगह काफी हद तक ले ली है। लेकिन इसी बदलते दौर में गोरखपुर के एक बुजुर्ग दंपती ऐसे भी हैं, जो सात दशकों से मिट्टी के दीये बनाकर भारतीय परंपरा की लौ जलाए हुए हैं। उम्र ढल चुकी है, शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता और मेहनत के मुकाबले कमाई भी बेहद कम है, लेकिन पुश्तैनी काम छोड़ने का मन नहीं होता।

पिपरौली ब्लॉक के रामपुर गांव निवासी रामजियावन कुम्हार और उनकी पत्नी गिरजा देवी आज भी मिट्टी को अपने हाथों से आकार देकर दीये और दीपावली में इस्तेमाल होने वाले बर्तन तैयार कर रहे हैं। करीब 70 वर्षों से इस काम में जुटे रामजियावन के लिए मिट्टी का दीया सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि परिवार की विरासत और संस्कृति को बचाने की कोशिश है। वहीं, पैर में चोट के बावजूद उनका साथ दे रहीं गिरजा देवी भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटी हैं। पूरे सीजन की मेहनत के बदले उन्हें कुछ अनाज और दो-चार हजार रुपये ही मिलते हैं, लेकिन दीपावली आते ही उनके हाथों की रफ्तार बढ़ जाती है।

सात दशक से मिट्टी को आकार दे रहे रामजियावन

गोरखपुर के रामपुर गांव निवासी रामजियावन कुम्हार बताते हैं कि वह पिछले करीब 70 वर्षों से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का काम कर रहे हैं। बचपन से शुरू हुआ यह सफर अब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मिट्टी को आकार देने और उससे लोगों के घरों तक खुशियां पहुंचाने में लगा दी। रामजियावन के मुताबिक, पहले के समय में मिट्टी आसानी से मिल जाती थी और इस काम को करने में ज्यादा खर्च भी नहीं आता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं। जिस मिट्टी का पहले कोई खास मोल नहीं था, उसे भी अब खरीदना पड़ता है। कच्चा माल महंगा हो गया है, जबकि तैयार दीयों और बर्तनों की कीमत मेहनत के हिसाब से नहीं मिलती।

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अपनी संतानें भी नहीं चलाना चाहतीं मिट्टी का चाक

रामजियावन कुम्हार के सामने सबसे बड़ी चिंता इस पुश्तैनी काम के भविष्य को लेकर है। उनका कहना है कि आज की युवा पीढ़ी मिट्टी के बर्तन बनाने के काम में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। यहां तक कि उनकी अपनी संतानें भी मिट्टी का चाक चलाने के पक्ष में नहीं हैं। उनके मुताबिक, अब लोग ऐसे काम करना चाहते हैं, जिनमें मेहनत के बदले अच्छी कमाई हो सके। मिट्टी के बर्तन बनाने में काफी समय और शारीरिक मेहनत लगती है, लेकिन आमदनी सीमित रहती है। यही वजह है कि नई पीढ़ी इस पेशे से दूर होती जा रही है।

पति के साथ दीये बना रहीं गिरजा देवी (IMG: Dynamite News)

पति के साथ दीये बना रहीं गिरजा देवी

रामजियावन की पत्नी गिरजा देवी की कहानी भी संघर्ष और परंपरा के प्रति समर्पण की मिसाल है। उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें भी शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पैर में चोट लगने के कारण वह पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद पति के साथ मिलकर मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने में जुटी रहती हैं। गिरजा देवी बताती हैं कि इस काम में काफी मेहनत लगती है, लेकिन उसके हिसाब से उचित दाम नहीं मिल पाता। इसके बावजूद दीपावली के समय दीये बनाने का काम छोड़ने का मन नहीं होता। वह बताती हैं कि पति के साथ मिलकर दीये, कोसा और त्योहार में इस्तेमाल होने वाले दूसरे मिट्टी के बर्तन तैयार करती हैं।

आधुनिक झालरों के बीच मिट्टी के दीयों की उम्मीद

दीपावली के बाजार में अब बिजली से जलने वाली झालरों और विदेशी लाइटों की मांग बढ़ रही है। लोग घरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों को सजाने के लिए आधुनिक उपकरणों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका असर मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों के कारोबार पर भी पड़ रहा है। रामजियावन और गिरजा देवी जैसे कुम्हारों के लिए यह बदलाव सिर्फ कारोबार में कमी का मामला नहीं है, बल्कि एक पारंपरिक कला के धीरे-धीरे पीछे छूटने की चिंता भी है। मिट्टी के दीये बनाने में मिट्टी तैयार करने से लेकर उसे आकार देने और पकाने तक काफी मेहनत करनी पड़ती है। इसके बावजूद बाजार में उन्हें अपनी मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिलती।

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कमाई से ज्यादा अपनी विरासत बचाने की चिंता

रामजियावन और गिरजा देवी के लिए दीपावली महज रोशनी का त्योहार नहीं है। यह उनकी जिंदगी के करीब सात दशकों की मेहनत, संघर्ष और परंपरा से जुड़ी हुई है। आर्थिक स्थिति भले ही मजबूत न हो, लेकिन मिट्टी को आकार देकर दीये तैयार करने का उनका जुनून आज भी बरकरार है। एक तरफ बाजार में आधुनिकता की चमक है तो दूसरी तरफ रामपुर गांव का यह बुजुर्ग दंपती अपने हाथों से मिट्टी के दीयों में रोशनी भर रहा है।

Location :  Gorakhpur

Published :  3 November 2026, 3:08 PM IST