Chitrakoot News: दशहरे पर रावण को जलाते नहीं, पूजते हैं ग्रामीण, 250 साल पुरानी है परंपरा

चित्रकूट के रैपुरा गांव में दशहरे पर रावण का पुतला जलाया नहीं जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा करीब 250 साल पुरानी है। गांव के बीचोंबीच स्थापित रावण की विशाल प्रतिमा के सामने लोग पूजा-अर्चना करते हैं। रामलीला में रावण का वध होता है, लेकिन पुतला दहन नहीं किया जाता। ग्रामीण रावण को महान विद्वान और ज्ञान का प्रतीक मानते हैं।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 20 October 2026, 2:26 PM IST

Chitrakoot: दशहरे पर देशभर में रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के रैपुरा गांव में परंपरा कुछ अलग है। यहां दशहरे पर रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है। ग्रामीणों का दावा है कि यह परंपरा करीब 250 साल पुरानी है। गांव के बीचोंबीच स्थापित रावण की विशाल प्रतिमा के सामने लोग दशहरे समेत कई शुभ अवसरों पर पूजा-अर्चना करते हैं। ग्रामीण रावण को केवल लंकापति नहीं, बल्कि महान विद्वान और ज्ञान का प्रतीक भी मानते हैं।

रैपुरा गांव में रावण की पूजा की अनोखी परंपरा

चित्रकूट के रैपुरा गांव में रावण की विशाल प्रतिमा स्थापित है। ग्रामीणों की मान्यता है कि रावण विद्वान था और चारों वेदों तथा छह शास्त्रों का ज्ञाता था। इसी वजह से गांव में उसकी विद्वता का सम्मान किया जाता है। ग्रामीणों के मुताबिक, दशहरे के अलावा भी कई पर्वों और शुभ अवसरों पर रावण की प्रतिमा के सामने पूजा की जाती है। गांव में किसी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले भी रावण की पूजा करने की परंपरा बताई जाती है।

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रावण का वध, लेकिन पुतले का दहन नहीं

दशहरे के अवसर पर रैपुरा गांव में रामलीला का आयोजन किया जाता है। यहां रामलीला के दौरान रावण का वध तो होता है, लेकिन उसके पुतले को जलाने की परंपरा नहीं है। इसके बजाय ग्रामीण रावण की प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना करते हैं। यही परंपरा इस गांव को दशहरे के मौके पर चर्चा में ले आती है। जहां देश के अलग-अलग हिस्सों में रावण दहन के आयोजन होते हैं, वहीं रैपुरा में उसकी विद्वता और ज्ञान के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है।

IAS-PCS की सफलता को आशीर्वाद से जोड़ते

गांव के प्रधान जगदीश पटेल के मुताबिक, रैपुरा में रावण की पूजा की परंपरा लगभग 250 साल पुरानी है। उन्होंने बताया कि वह खुद भी किसी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले रावण की पूजा करते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि गांव के कई युवाओं ने शिक्षा हासिल कर IAS, PCS और दूसरी सरकारी सेवाओं में सफलता प्राप्त की है। वे इस उपलब्धि को रावण के आशीर्वाद और उसकी विद्वता के प्रति अपनी आस्था से जोड़ते हैं। हालांकि, यह ग्रामीणों की मान्यता है।

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देशभर की परंपरा से अलग है रैपुरा की मान्यता

दशहरे पर रावण दहन को आमतौर पर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। वहीं, रैपुरा गांव में रावण के विद्वान पक्ष को महत्व देते हुए उसकी पूजा की जाती है। ग्रामीणों की यह परंपरा रावण के व्यक्तित्व के एक अलग पहलू को सामने लाती है। आस्था, लोकविश्वास और वर्षों से चली आ रही मान्यताओं से जुड़ी यह परंपरा हर साल दशहरे पर रैपुरा गांव को खास पहचान देती है।

Location :  Chitrakoot

Published :  20 October 2026, 2:26 PM IST