
नई दिल्ली: अप्रैल की शुरुआत में हमें यह देखने को मिलेगा कि क्या दुनिया संरक्षणवाद की ओर बढ़ेगी या मुक्त व्यापार को अपनाएगी। अगर अमेरिका अन्य देशों से आने वाले उत्पादों पर दंडात्मक शुल्क लगाता है तो यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और समझौतों का उल्लंघन होगा।
डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए कानूनी बाधाएं ज्यादा मायने नहीं रखतीं और उन्होंने पहले ही लक्षित देशों की सूची बना ली है, जिनमें भारत भी शामिल है।
टैरिफ और उसकी आर्थिक समझ
टैरिफ किसी देश के घरेलू बाजार को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने का एक तरीका है। इसके अलावा एंटी-डंपिंग शुल्क और सुरक्षा शुल्क भी लगाए जाते हैं। जो आमतौर पर घरेलू उद्योग को समर्थन देने के लिए होते हैं। इसके अतिरिक्त गुणवत्ता मानकों और अन्य नीतियों के माध्यम से गैर-टैरिफ बाधाएं भी खड़ी की जाती हैं। जिसे संरक्षणवाद की नीति के तहत देखा जा सकता है।
संरक्षणवाद: लाभ या हानि?
संरक्षणवाद को कभी आत्मनिर्भरता का साधन माना गया, लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों ने इसे गलत साबित किया है। कोई भी देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। संरक्षणवादी नीतियां आमतौर पर आर्थिक विकास की गति को धीमा कर देती हैं। निवेश घटता है और उपभोक्ताओं को कम विकल्प मिलते हैं। इतिहास बताता है कि वे देश सबसे अधिक समृद्ध हुए हैं। जिन्होंने मुक्त व्यापार को अपनाया है।
भारत ने 40 वर्षों तक संरक्षणवाद की नीति अपनाई। जिससे आयात-निर्यात दोनों प्रभावित हुए। 1991 में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत ने उदारीकरण की ओर कदम बढ़ाया। जिससे अर्थव्यवस्था को नई गति मिली। लेकिन 2014 के बाद संरक्षणवादी नीतियों को दोबारा अपनाया जाने लगा, जिसे ‘आत्मनिर्भर भारत’ के नाम से प्रचारित किया गया।
भारत और वैश्विक व्यापार प्रणाली
भारत का औसत अंतिम बाध्य टैरिफ 50.8% और व्यापार भारित औसत टैरिफ 12.0% है। जो इसे एक उच्च-टैरिफ वाला देश बनाता है। हालांकि भारत के पास भी अपने कुछ हित हैं। जैसे कृषि, हस्तशिल्प और पारंपरिक उद्योग, जिनकी रक्षा करना आवश्यक है। ट्रंप प्रशासन ने पहले एल्युमिनियम और स्टील पर टैरिफ लगाया फिर ऑटोमोबाइल और अन्य उत्पादों पर। भारत ने 2025-26 के बजट में टैरिफ कटौती की घोषणा की लेकिन अमेरिका इससे प्रभावित नहीं हुआ। भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए मित्र देशों का सहयोग लेना होगा। कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अमेरिका के टैरिफ युद्ध में भारत के संभावित सहयोगी हो सकते हैं।
क्या है टैरिफ वॉर
टैरिफ वॉर (Tariff War) एक व्यापारिक स्थिति होती है। जब दो या दो से अधिक देश एक-दूसरे पर उच्च आयात शुल्क (tariffs) लगाने लगते हैं। यह आमतौर पर तब होता है जब एक देश दूसरे देश के उत्पादों पर शुल्क बढ़ाता है और दूसरा देश प्रतिक्रिया स्वरूप उसी उत्पादों या अन्य उत्पादों पर शुल्क बढ़ा देता है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार पर असर पड़ता है और आमतौर पर यह व्यापारिक तनाव को बढ़ाता है।
टैरिफ वॉर के नतीजा
1. ग्राहकों पर असर
जब अमेरिका अपनी कंपनियों पर आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ाता है तो इन कंपनियों के लिए आयातित सामान को बेचना महंगा हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप इन कंपनियों को अपनी बढ़ी हुई लागत की भरपाई के लिए कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं। इसका मतलब है कि ग्राहकों को अधिक पैसे चुकाने पड़ते हैं और वे महंगे उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर होते हैं। यह ग्राहकों पर एक तरह का बोझ डालता है, क्योंकि उनकी खरीदारी की लागत बढ़ जाती है। भले ही उत्पाद का उत्पादन देश में न हुआ हो।
2. देशों की अर्थव्यवस्था पर असर
जब एक देश जैसे अमेरिका दूसरे देश के उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाता है तो उस दूसरे देश के उत्पाद महंगे हो जाते हैं। जिससे उन उत्पादों की बिक्री अन्य देशों में घट जाती है। इसका सीधा असर व्यापार पर पड़ता है और उस देश की व्यापारिक स्थिति कमजोर हो जाती है। चीन जैसे देशों को यह नुकसान झेलना पड़ता है क्योंकि उनके उत्पाद अमेरिका में महंगे हो जाते हैं। इसके कारण चीन को कम मुनाफा होता है, और उसे अपनी कीमतें घटानी पड़ सकती हैं। जिससे मुनाफे में कमी आती है।
3. अर्थशास्त्री यांग झाऊ का अध्ययन
शंघाई फुदान यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री यांग झाऊ ने कहा था कि चीन पर अमेरिकी टैरिफ ने चीन की अर्थव्यवस्था को अमेरिका की अर्थव्यवस्था से तीन गुना ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। इसका कारण यह है कि जब चीन के उत्पाद महंगे हो जाते हैं, तो अमेरिका के बाजार में उनकी बिक्री में गिरावट आती है, जिससे चीन की उत्पादकता और आयात निर्यात पर बुरा असर पड़ता है।
Published : 30 March 2025, 11:52 AM IST
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