
ब हाथ में आया फीफा वर्ल्ड कप का मौका भारत ने खुद ठुकरा दिया (Img- Internet)
New Delhi: भारतीय खेल इतिहास में जब भी सबसे बड़े अफसोस की बात होती है, तो साल 1983 के क्रिकेट वर्ल्ड कप की जीत का जिक्र जरूर आता है, जिसने देश में क्रिकेट की तस्वीर बदल दी। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ऐसा ही एक सुनहरा मौका भारतीय फुटबॉल को क्रिकेट से पूरे 33 साल पहले यानी 1950 में मिला था। उस साल ब्राजील में फीफा वर्ल्ड कप (FIFA World Cup) का आयोजन होना था और भारत ने इसके लिए आधिकारिक तौर पर क्वालीफाई भी कर लिया था।
पूरे देश को उम्मीद थी कि भारतीय टीम दुनिया के सबसे बड़े मंच पर दम दिखाएगी, लेकिन ऐन वक्त पर अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) ने अपने कदम पीछे खींच लिए। यह एक ऐसा फैसला था जिसने भारतीय फुटबॉल को दशकों पीछे धकेल दिया और आज भी इसे खेल जगत का सबसे बड़ा रहस्य माना जाता है।
यह कहानी जितनी हैरान करने वाली है, उतनी ही दिलचस्प भी है। साल 1950 का विश्व कप दूसरे विश्व युद्ध की तबाही के बाद आयोजित होने वाला पहला बड़ा टूर्नामेंट था। उस दौर में वैश्विक यात्राएं बेहद महंगी, थकाऊ और जटिल हुआ करती थीं। आर्थिक तंगी और लॉजिस्टिक दिक्कतों के कारण कई देशों ने इस वर्ल्ड कप से अपने नाम वापस ले लिए थे। क्वालीफिकेशन के लिए कुल 34 टीमों में से 16 का चयन होना था।
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आजाद भारत को बर्मा (अब म्यांमार), इंडोनेशिया और फिलीपींस के साथ एशियाई क्वालीफाइंग ग्रुप में रखा गया था। लेकिन किस्मत देखिए, ग्रुप मैच शुरू होने से ठीक पहले बाकी तीनों देशों ने अपने नाम वापस ले लिए। नतीजा यह हुआ कि भारतीय पुरुष फुटबॉल टीम बिना एक भी मैच खेले सीधे वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर गई। भारत का नाम बकायदा ऑफिशियल ड्रॉ में इटली, स्वीडन और पराग्वे के साथ ग्रुप-3 में शामिल भी कर लिया गया था।
फुटबॉल के गलियारों में सालों से यह अफवाह बहुत चाव से सुनी और सुनाई जाती है कि फीफा (FIFA) ने भारतीय खिलाड़ियों को नंगे पैर खेलने की इजाजत नहीं दी थी, इसलिए नाराज होकर भारत ने टूर्नामेंट छोड़ दिया। इस अफवाह को हवा मिलने की एक बड़ी वजह थी साल 1948 का लंदन ओलंपिक। उस ओलंपिक में भारतीय टीम ने दिग्गज फ्रांस को कड़ी टक्कर दी थी और तब कप्तान तालिमेरन आओ समेत कई भारतीय खिलाड़ी पैरों में सिर्फ पट्टियां बांधकर नंगे पैर मैदान पर उतरे थे।
लेकिन हकीकत यह है कि जूतों वाली बात सिर्फ एक मनगढ़ंत कहानी थी। सच तो यह है कि फीफा ने साल 1953 तक खिलाड़ियों के लिए जूते पहनना अनिवार्य करने का कोई नियम ही नहीं बनाया था। भारत ने इसके बाद 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भी बिना किसी रोक-टोक के नंगे पैर फुटबॉल मैच खेला था।
वर्ल्ड कप न खेलने की असली वजह कोई पाबंदी नहीं, बल्कि हमारे खेल प्रशासन का ढुलमुल रवैया, प्राथमिकताओं का टकराव और पैसों की तंगी थी। उस दौर में भारत नया-नया आजाद हुआ था और एक पूरी टीम को दुनिया के दूसरे कोने (ब्राजील) भेजना बहुत खर्चीला काम था। हालांकि, फीफा और ब्राजीलियाई फुटबॉल संघ ने यात्रा खर्च उठाने की बात कही थी, लेकिन कोलकाता में हुई एआईएफएफ (AIFF) की बैठक के बाद जारी प्रेस रिलीज में कहा गया कि देर से सूचना मिलने के कारण टीम के चयन और तैयारी के लिए पर्याप्त समय नहीं है।
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इसके अलावा, तत्कालीन एआईएफएफ अध्यक्ष मोइन-उल-हक को डर था कि अगर हमारी नई टीम पेशेवर यूरोपीय और दक्षिण अमेरिकी टीमों के सामने बुरी तरह हार गई, तो ओलंपिक में बनी भारत की साख खराब हो जाएगी। एक और कड़वा सच यह था कि उस समय भारत में घरेलू फुटबॉल मैच 90 मिनट के बजाय सिर्फ 70 मिनट के होते थे, जिससे खिलाड़ियों की इंटरनेशनल फिटनेस पर भी गहरा संदेह था। कुल मिलाकर, दूरदर्शिता की कमी ने भारत से इतिहास रचने का वो मौका छीन लिया जो शायद दोबारा कभी नहीं आया।
Location : New Delhi
Published : 13 June 2026, 9:50 AM IST