गजनवी से लेकर मुगलों तक… बार-बार टूटकर भी खड़ा हुआ सोमनाथ मंदिर, जानिये गौरवशाली इतिहास

सोमनाथ मंदिर का इतिहास सतयुग से कलियुग तक है। इसे कभी सोने, चांदी, लकड़ी और पत्थर से बनाया गया बताया जाता है। बार-बार आक्रांताओं के हमलों के बावजूद यह मंदिर टूटकर भी हर बार बना और आज भी आस्था का प्रमुख केंद्र है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 11 May 2026, 3:48 PM IST

New Delhi: सोमनाथ मंदिर, भारत के गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर है। इसे भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान प्राप्त है और यह हिंदुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल माना जाता है। सोमनाथ मंदिर त्रिवेणी संगम - कपिला, हिरण और सरस्वती नदियों के मिलन स्थल पर स्थित है। सोमनाथ मंदिर का इतिहास इतना प्राचीन है कि इसे 649 ईसा पूर्व से भी पहले का माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सोमराज (चंद्र देवता) ने सबसे पहले सोने से बना एक मंदिर बनवाया था। इसके बाद रावण ने इसे चांदी से, भगवान कृष्ण ने लकड़ी से और भीमदेव ने पत्थर से बनवाया।

हिंदू ग्रंथों में क्या है सोमनाथ मंदिर का इतिहास?

मंदिर का प्राचीन इतिहास दर्शाता है कि इसकी भव्यता और समृद्धि ने हमेशा आक्रांताओं का ध्यान आकर्षित किया। 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी के हमले से पहले यह मंदिर कई बार बन चुका था और बार-बार नष्ट हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर पर अब तक मुगलकाल तक लगभग 17 हमले हुए।

हिंदू ग्रंथों के अनुसार, सोमनाथ मंदिर का इतिहास चार युगों में विभाजित है। सतयुग में राजा चंद्रदेव सोमराज ने इस मंदिर का निर्माण पूरी तरह सोने से करवाया था। त्रेतायुग में इसे रावण ने चांदी से बनवाया, जबकि द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे लकड़ी से पुनर्निर्मित किया। कलियुग में राजा भीमदेव सोलंकी ने मंदिर को पत्थर की कारीगरी से बनवाया। 1026 में महमूद गजनवी के हमले के बाद इसे मुगलकाल तक करीब 17 बार तोड़ा गया और फिर पुनः निर्माण किया गया।

कुंभाभिषेक क्या है और पीएम मोदी ने 75 साल बाद सोमनाथ में क्यों किया भव्य आयोजन?

इतिहास की किताबों में मंदिर का विवरण

सोमनाथ मंदिर आदिकाल से ही हिंदुओं के लिए तीर्थ स्थल रहा है। अमेरिकी धार्मिक इतिहासकार जे. गॉर्डन मेल्टन के अनुसार, 649 ईसा में यादव राजा वल्लभी ने मंदिर के पास एक और मंदिर बनवाया। इसके बाद 725 ईसा में सिंध क्षेत्र के अरब शासक अल-जुनायद ने गुजरात और राजस्थान पर आक्रमण करते हुए राजा वल्लभी द्वारा बनवाए गए मंदिर को नष्ट कर दिया।

1026 ईस्वी में अरब यात्री अल-बरूनी ने अपने यात्रा वृत्तांत में सोमनाथ मंदिर का विवरण लिखा। इससे प्रभावित होकर महमूद गजनवी ने 1024 में सोमनाथ पर हमला किया, मंदिर को लूटकर नष्ट किया और करीब 50,000 भक्तों की हत्या की। कहा जाता है कि गजनवी ने इस दौरान मंदिर से दो करोड़ दिनार यानी वर्तमान समय में लगभग 500 करोड़ रुपये की संपत्ति लूटी।

गजनवी के हमले के बाद सोलंकी राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। लेकिन मंदिर का विनाश सिलसिला जारी रहा। 1299 में दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात पर कब्जा कर मंदिर को फिर से तबाह किया। 1394 में सौराष्ट्र के हिंदू राजा महिपाल-I ने मंदिर को पुनः बनवाया, लेकिन मुजफ्फर शाह ने इसे फिर से नष्ट किया। इसके बाद मंदिर लंबे समय तक क्षतिग्रस्त अवस्था में रहा।

सोमनाथ मंदिर में प्रधानमंत्री मोदी ने जल चढ़ाकर की विशेष पूजा

मुगलकाल और मंदिर का संघर्ष

1665 से 1706 तक मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर में कई बार तोड़फोड़ की। खासकर 1665 में जब मंदिर को ध्वस्त करने के बाद भी भक्त यहां आते रहे, तो औरंगजेब ने सैन्य टुकड़ी भेजी और बड़ी संख्या में लोगों की हत्या करवाई। इसके बाद 18वीं सदी के अंत तक मंदिर क्षतिग्रस्त रहा। 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने ध्वस्त मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्होंने सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं कराया और नए मंदिर को कुछ दूरी पर बनवाया।

आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण

अंग्रेजों के शासन के दौरान मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं हुआ। स्वतंत्रता के बाद, 13 नवंबर 1947 को उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया। इस काम के लिए आर्किटेक्ट प्रभाशंकर सोमपुरा को बुलाया गया और 28 किमी दूर चोरवाड से चूना पत्थर मंगवाया गया। पत्थरों को 'नागर' शैली में तराशा गया।

केएम मुंशी ने मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए महात्मा गांधी से अनुमति मांगी। गांधीजी ने कहा कि यह काम सरकार के बजाय लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। इसके बाद मुंशी की अध्यक्षता में ट्रस्ट का गठन हुआ, जिसमें भारत सरकार और सौराष्ट्र सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल थे। 1950 में सरदार पटेल की मृत्यु के बाद मंदिर का निर्माण मुंशी के कंधों पर आ गया।

हालांकि, उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सरकार के रूप में मंदिर के पुनर्निर्माण से विरोध किया। उनका तर्क था कि धार्मिक गतिविधियों में सरकारी सहभागिता धर्मनिरपेक्ष भारत के दृष्टिकोण के खिलाफ है। इतिहासकार रोमिला थापर लिखती हैं कि नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि भारत सरकार का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है।

1951 में पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन

2 मई 1951 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की सलाह को अनसुना करते हुए पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया। उद्घाटन के समय सौराष्ट्र सरकार ने मंदिर निर्माण में करीब पांच लाख रुपये का योगदान दिया। 11 मई 1951 को मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इस समारोह में प्रधानमंत्री नेहरू उपस्थित नहीं हुए, लेकिन मंदिर का पुनर्निर्माण जनता की आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बनकर उभरा।

मंदिर का अंतिम रूप और वर्तमान स्थिति

सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण लगभग 45 वर्षों में पूरा हुआ। 1 दिसंबर 1995 को राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने मंदिर को देश को समर्पित किया। वर्तमान में सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जबकि पहले ट्रस्ट के अध्यक्ष सरदार पटेल थे। 2021 में प्रधानमंत्री मोदी ने सोमनाथ मंदिर के लिए कई नई परियोजनाओं का वर्चुअल उद्घाटन किया और इसे श्रद्धा व आस्था का प्रतीक बताया।

Location :  New Delhi

Published :  11 May 2026, 3:48 PM IST