
भारत अमेरिका व्यापार समझौता (सोर्स- एक्स)
New Delhi: अमेरिका ने रूस के खिलाफ एक बड़ा कदम उठाते हुए 'सैंक्शनिंग रशा एंड ईरान एक्ट' पास कर दिया है। इस बिल के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों (विशेषकर भारत और चीन) पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। सतह पर भले ही यह कानून रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए बनाया गया, लेकिन इसके पीछे एक छिपा हुआ भू-राजनीतिक एंगल यह भी है कि क्या अमेरिका इस तरह के हथकंडों से भारत और रूस की गहरी होती दोस्ती और व्यापारिक रिश्तों में दरार डालना चाहता है?
यह कोई पहला मौका नहीं है जब अमेरिकी प्रशासन ने भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की हो। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यकाल और मौजूदा नीतियों के दौरान भी भारत-रूस संबंधों को कमजोर करने के कई प्रयास किए गए थे।
पुराने असफल प्रयास: ट्रंप प्रशासन ने पहले भी भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद को रोकने के लिए कई तरह के आर्थिक दबाव और अतिरिक्त टैरिफ लगाने के रास्ते तलाशे थे, लेकिन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा जरूरतों के आगे वे प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सके थे।
रणनीतिक साझेदारी पर चोट: जानकारों का मानना है कि अमेरिका इस बात से असहज रहता है कि तमाम पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत और रूस के व्यापारिक रिश्ते मजबूत बने हुए हैं। 100% टैरिफ का यह नया कानूनी हथियार दरअसल उसी पुरानी रणनीति का एक नया और बढ़ा हुआ रूप है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बिल के जरिए अमेरिका भारत के सामने एक कड़ा विकल्प रख रहा है या तो वह रूस से दूरी बनाए या फिर अमेरिकी बाजार में भारी-भरकम टैक्स का सामना करने के लिए तैयार रहे।
दबाव की राजनीति: ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के जानकारों का भी मानना है कि रूसी तेल पर टैरिफ का यह खौफ असल में अमेरिका का वह पैंतरा है, जिसके जरिए भारत पर आगामी व्यापार समझौतों को असमान और अमेरिकी शर्तों पर मानने का दबाव बनाया जा सके।
ऊर्जा सुरक्षा बनाम कूटनीति: भारत अपनी 1.4 अरब की आबादी के लिए सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा सुनिश्चित करने के वास्ते रूसी तेल का आयात करता है। अमेरिका के ऐसे प्रतिबंध इस बात की ओर इशारा करते हैं कि वह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रूस के साथ उसके पारंपरिक संबंधों को असहज करने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिकी संसद में यह बिल पास होने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि देश अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। भारत ने अमेरिका को यह भी स्पष्ट कर दिया है कि रूस से तेल की खरीद किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए है।
अब देखना यह होगा कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप इस कानून का इस्तेमाल भारत-रूस संबंधों में खटास पैदा करने के लिए एक 'हथियार' के रूप में करते हैं, या फिर भारत अपनी कूटनीतिक कड़े रुख से अमेरिका को अपने फैसले बदलने पर मजबूर कर पाता है।
Location : New Delhi
Published : 17 September 2026, 12:07 PM IST