The Candid Talk: ब्यूरोक्रेसी कितनी स्वतंत्र? उत्तराखंड को 25 साल बाद भी नहीं मिला इंसाफ, IAS विनोद रतूड़ी ने खोले सिस्टम के राज

देश की नौकरशाही को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या प्रशासनिक अधिकारी वास्तव में स्वतंत्र होकर फैसले ले पाते हैं या फिर राजनीतिक और सिस्टम के दबाव में काम करना पड़ता है। इसी मुद्दे पर डाइनामाइट न्यूज़ के पॉडकास्ट शो The Candid Talk में उत्तराखंड कैडर के आईएएस अधिकारी Vinod Raturi ने प्रशासनिक सेवा के अपने अनुभव साझा किए और कई अहम सवालों पर खुलकर अपनी बात रखी।

Post Published By: Sapna Srivastava
Updated : 15 March 2026, 11:59 AM IST

New Delhi: डाइनमाइट न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ मनोज टिबड़ेवाल आकाश के साथ पॉडकास्ट में The Candid Talk में बातचीत के दौरान शुरुआत करते हुए कहा, "हम सिस्टम को बाहर से देखते हैं। आदेश, फाइल, ट्रांसफर और बयान। आदेश के पीछे एक व्यक्ति होता है और फाइल के पीछे एक निर्णय होता है। इसके अलावा एक निर्णय के पीछे कठिन संघर्ष। सत्ता सिर्फ अधिकार नहीं देती है, अंतरात्मा की परीक्षा भी लेती है। क्या सही फैसला लेना हमेशा सुरक्षित होता है।" इन्हीं मुद्दों पर आईएएस विनोद रतूड़ी से सवाल-जवाब किए।

डाइनमाइट न्यूज़ के पॉडकास्ट The Candid Talk में सीनियर आईएएस अफसर विनोद रतूड़ी ने बताया कि वह पहले एक प्रोफेसर के रूप में काम कर रहे थे। उस समय वह University of Allahabad से डी-फिल (डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी) की पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने देखा कि कई लोग सिविल सेवा की तैयारी कर रहे हैं, जिसके बाद उन्होंने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया। 

प्रोफेसर से सिविल सेवा तक का सफर

उन्होंने बताया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश पीसीएस की परीक्षा दी और उसमें टॉपर रहे। हालांकि रिजल्ट में देरी होने के कारण उन्हें करीब एक साल तक मध्य प्रदेश में प्रोफेसर के तौर पर काम करना पड़ा। बाद में प्रशासनिक सेवा में उनका चयन हुआ और वह कई जिलों में एडीएम-एसडीएम के रूप में कार्य करते रहे।

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद मिली जिम्मेदारी

विनोद रतूड़ी ने बताया कि जब उत्तराखंड का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ, तो उनसे भी विकल्प मांगा गया। वो उत्तराखंड आ गये। उत्तराखंड कैडर मिलने पर वह देहरादून पहुंचे और 11 नवंबर को अपनी जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने बताया कि वह मूल रूप से चमोली जिले के रहने वाले हैं और राज्य गठन के बाद उन्हें अपने ही क्षेत्र में प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने का मौका मिला। उनके मुताबिक, उस समय संसाधनों की काफी कमी थी, लेकिन नई राज्य व्यवस्था को खड़ा करने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को कड़ी मेहनत करनी पड़ी।

ब्यूरोक्रेसी की स्वतंत्रता पर उठाए सवाल?

बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि आजादी के समय कुछ राजनीतिक नेताओं की सोच यह थी कि नौकरशाही उनके नियंत्रण में रहे। उन्होंने बताया कि आजादी से पहले प्रशासनिक अधिकारियों को (भारतीय सिविल सेवा) Indian Civil Service कहा जाता था, जिसे बाद में बदलकर (भारतीय प्रशासनिक सेवा) Indian Administrative Service कर दिया गया। उनका कहना है कि पहले प्रशासनिक अधिकारियों का प्रभाव और अधिकार अधिक मजबूत माना जाता था, लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया है।

ईमानदार अधिकारियों को झेलनी पड़ती हैं मुश्किलें?

आईएएस अधिकारी ने कहा कि सिस्टम में ईमानदारी से काम करना आसान नहीं होता। उनके मुताबिक, अगर कोई अधिकारी पूरी ईमानदारी से काम करता है तो उसे कई बार परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रांसफर प्रशासनिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण औजार है, जिसका उपयोग नियंत्रण और व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जाता है।

गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग

विनोद रतूड़ी ने कहा कि उत्तराखंड के लोग पिछले 26 वर्षों से स्थायी राजधानी की मांग कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धमकी से अपील करते हुए कहा कि 9 नवंबर 2026 को होने वाले विधानसभा सत्र में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाया जाए।

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  • New Delhi

Published : 
  • 15 March 2026, 11:59 AM IST