26 जनवरी 1950 को भारत ने पहला गणतंत्र दिवस मनाया। पुराना क़िला के पास स्टेडियम में परेड हुई, राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने तिरंगा फहराया। दिल्ली भर में जश्न, रोशनी, लंगर और समारोहों ने इतिहास रच दिया।

26 जनवरी 1950: जब भारत बना गणतंत्र
New Delhi: भारत आज अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। यह दिन हमें उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है, जब ठीक 76 साल पहले भारत ने औपचारिक रूप से स्वयं को एक संप्रभु गणतंत्र घोषित किया था। 26 जनवरी 1950 का दिन न सिर्फ संविधान लागू होने का साक्षी बना, बल्कि भारत के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत भी इसी दिन से हुई।
भारत का पहला गणतंत्र दिवस समारोह आज के राजपथ या कर्तव्य पथ पर नहीं, बल्कि पुराना क़िला के सामने स्थित ब्रिटिश स्टेडियम में आयोजित किया गया था। आज इसी स्थान पर दिल्ली का राष्ट्रीय स्टेडियम और चिड़ियाघर मौजूद है। इसी ऐतिहासिक मैदान पर पहली बार गणतंत्र दिवस की परेड आयोजित की गई थी।
देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जैसे ही तिरंगा फहराया, पूरा इलाका देशभक्ति के जयघोष से गूंज उठा। इसके साथ ही तोपों की सलामी दी गई, जिससे पुराना क़िला थर्रा उठा। इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी भी मौजूद थे।
जब पहली बार लहराया तिरंगा (Img- Internet)
गणतंत्र दिवस का मतलब था भारत द्वारा विदेशी शासन के अंतिम प्रतीकों को समाप्त करना। ब्रिटेन के किंग जॉर्ज VI ने भारत को शुभकामनाएं भेजीं और इस बात के लिए आभार जताया कि भारत राष्ट्रमंडल देशों में शामिल हुआ। कुछ समय बाद किंग जॉर्ज VI के निधन पर भारत में सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया गया।
पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर यह अफवाह भी उड़ी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक बार फिर ‘दिल्ली चलो’ के आह्वान के साथ सामने आ सकते हैं। हालांकि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन इन चर्चाओं ने दिनभर लोगों के बीच उत्सुकता बनाए रखी।
1950 की गणतंत्र दिवस परेड आज जैसी भव्य नहीं थी, लेकिन उसका ऐतिहासिक महत्व किसी से कम नहीं था। थल, जल और वायु सेना की चुनिंदा टुकड़ियों ने इसमें भाग लिया। उस समय झांकियां नहीं निकाली गई थीं और परेड स्टेडियम परिसर तक ही सीमित रही।
आज के आधुनिक जेट विमानों की जगह उस समय डकोटा और स्पिटफायर जैसे विमानों ने हवाई करतब दिखाए। भारतीय सेना के पहले प्रमुख फील्ड मार्शल केएम करियप्पा ने जवानों को संबोधित करते हुए कहा था, “आज हम भी आज़ाद, तुम भी आज़ाद और हमारा कुत्ता भी आज़ाद।”
उनकी इस पंक्ति ने पूरे माहौल में जोश भर दिया था।
पहले गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के बाजारों में उत्सव का माहौल था। चांदनी चौक को रंग-बिरंगी सजावट से सजाया गया था। घंटेवाला हलवाई और अन्य दुकानदारों ने मिठाइयां बांटीं। फूलमंडी के व्यापारियों ने गुलाब की पंखुड़ियों की बारिश कर दी।
26 जनवरी के इतिहास की अद्भभुत झलकियां (Img- Internet)
गुरुद्वारा शीशगंज, बंगला साहिब और रकाबगंज में विशाल लंगर आयोजित किए गए। मटिया महल इलाके के होटल करीम और जवाहर ने गरीबों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था की। पूरे शहर में भाईचारे और खुशी का माहौल था।
कनॉट प्लेस उस समय राजधानी का सबसे फैशनेबल इलाका माना जाता था। यहां नाचते-झूमते लोग, सजी दुकानें और संगीत ने माहौल को जीवंत बना दिया। ब्रिटिश सैनिकों की मालिश करने वाले राम लाल जैसे आम लोग भी इस खुशी का हिस्सा बने।
रात होते ही राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, इंडिया गेट, नॉर्थ और साउथ ब्लॉक समेत पूरी नई दिल्ली रोशनी से जगमगा उठी। राष्ट्रपति भवन को दुल्हन की तरह सजाया गया था।
पहली परेड की तस्वीर (Img- Internet)
डेविकोस और गेलोर्ड होटल में डांस कार्यक्रम हुए। एंग्लो-इंडियन क्लब के आयोजन में युवा लड़कियों का नृत्य आकर्षण का केंद्र रहा। इस दौरान कुछ रोचक घटनाएं भी हुईं, जो आज भी किस्सों के रूप में याद की जाती हैं।
राष्ट्रपति भवन में आयोजित रात्रिभोज में जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद और राजकुमारी अमृत कौर जैसी प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं। लोगों का मानना था कि दिल्ली ने इससे पहले इतना भव्य रूप कभी नहीं देखा था।
एंग्लो-इंडियन संगठन के अध्यक्ष सर हेनरी गिड्नी ने कहा था कि भारत वह धरती है जहां सभ्यता अपने चरम पर थी और अब वह फिर उसी दिशा में बढ़ेगा। यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है।