‘वंदे मातरम’ पर फिर छिड़ी बहस: 150 साल पुराने राष्ट्रगीत को लेकर राजनीति, धर्म और संवैधानिक अधिकारों की टकराहट तेज

‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने पर देश में पुरानी बहस फिर तेज हो गई है। मुस्लिम विद्वान इसे इस्लामिक सिद्धांतों के खिलाफ बताते हैं, जबकि सरकार इसे राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानती है। अनिवार्य करने के फैसले ने राजनीतिक और धार्मिक तनाव को और बढ़ा दिया है।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 8 December 2025, 8:09 AM IST

New Delhi: भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ लिखे जाने के 150 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर संसद में विशेष चर्चा का प्रस्ताव है, जिसके पहले ही देशभर में एक पुरानी बहस फिर से तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा था कि कांग्रेस ने “वंदे मातरम की आत्मा को तोड़ दिया”, और इसी विभाजन ने आगे चलकर देश के बंटवारे के बीज बोए। उनके इस बयान के बाद राष्ट्रीय गीत को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी नई ऊंचाइयों पर पहुँच गई है।

उधर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के सभी स्कूलों में ‘वंदे मातरम’ का अनिवार्य गायन लागू करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि, “कोई भी धर्म राष्ट्र से ऊपर नहीं।” इस फैसले के तुरंत बाद विवाद खड़ा हो गया और मुस्लिम संगठनों के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।

मुस्लिम संगठन और नेताओं की आपत्तियां

योगी सरकार के फैसले के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि अनिवार्य करना उन्हें स्वीकार नहीं है, जबकि सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने साफ कहा कि “गीत में हमारे मजहब के खिलाफ शब्द हैं, इसलिए हम इसे नहीं गाएँगे।”

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‘वंदे मातरम इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ’

इस्लामी स्कॉलर मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी कहते हैं कि यह गीत मूल रूप से बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंद मठ’ का अंश है। उन्होंने बताया कि इसके कई छंदों में देवी दुर्गा की स्तुति है, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (तौहीद) के सिद्धांत से टकराती है। नोमानी बताते हैं कि गीत की मूल 7 में से 5 पंक्तियों में दुर्गा की आराधना है। मां की पूजा, जल-पवन-धरा की आराधना, और मातृभूमि को देवी रूप में चित्रित करना इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध है। इस्लाम अल्लाह के अलावा किसी और को पूज्य नहीं मानता।

‘यह दुर्गा स्तुति के रूप में लिखा गया गीत’

नोमानी आगे कहते हैं कि “यह गीत अंग्रेजों और मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का आह्वान करने वाले संतों के प्रशंसा के लिए लिखा गया था।” इसका अर्थ है कि कई मुस्लिम विद्वान मानते हैं कि गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी उन्हें असहज करती है।

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टैगोर और बोस ने भी समझी थी मुस्लिमों की चिंता

इस विवाद की जड़ नई नहीं है। 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर ने सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर कहा था कि ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य न किया जाए, क्योंकि इसकी कुछ पंक्तियां मुसलमानों के मजहबी भावनाओं के अनुकूल नहीं हैं। इसी सिफारिश के बाद गीत के 7 में से 5 छंद हटा दिए गए और सिर्फ 2 छंद को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया, लेकिन विवाद फिर भी कभी शांत नहीं हुआ।

‘वंदे मातरम पढ़ना शिर्क’

प्रसिद्ध इस्लामी स्कॉलर मुफ्ती ओसामा नदवी कहते हैं कि मुसलमानों को मातृभूमि से प्रेम करने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन “पूजा” या “वंदना” इस्लाम में केवल अल्लाह के लिए है। उनके अनुसार संस्कृत शब्द ‘वंदे’ का अर्थ पूजन/स्तुति करना है। “मां, मैं तुम्हारी स्तुति करता हूँ” कहना मुसलमानों के लिए ‘शिर्क’ है। शिर्क इस्लाम में सबसे बड़ा अक्षम्य अपराध माना जाता है। इसलिए वे कहते हैं कि गीत का धार्मिक अर्थ मुस्लिम समुदाय के लिए समस्या पैदा करता है, देशभक्ति नहीं।

‘अनिवार्यता संविधान के खिलाफ’

मौलाना मदनी का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है और अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इस लिहाज से किसी छात्र या नागरिक को 'वंदे मातरम' गाने के लिए मजबूर करना संवैधानिक रूप से गलत है। उनके अनुसार, “इबादत के रूप में किसी देवी की उपासना करना इस्लाम की मूल आस्था से टकराता है। इसलिए ‘वंदे मातरम’ अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है।”

‘जन-गण-मन गाते हैं, तो वंदे मातरम क्यों थोप रहे?’

शिया विद्वान मौलाना सैफ अब्बास कहते हैं कि मुसलमानों को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से कोई आपत्ति नहीं, परंतु ‘वंदे मातरम’ का उद्देश्य और पंक्तियाँ उनके इस्लामी अकीदे को प्रभावित करती हैं। उनके अनुसार यह देशभक्ति का नहीं बल्कि धार्मिक उपासना का मामला है। भारत माता को देवी के रूप में चित्रित करना इस्लामी सिद्धांतों से मेल नहीं खाता। अनिवार्य किए जाने पर विवाद स्वाभाविक है।

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  • New Delhi

Published : 
  • 8 December 2025, 8:09 AM IST