
पंडवानी गायिका तीजनबाई (सोर्स- AI)
Raipur: छत्तीसगढ़ की मिट्टी से उठकर पूरी दुनिया में पंडवानी की गूंज पैदा करने वाली सुरों की महानायिका तीजनबाई का सफर थम गया है। 13 साल की नन्हीं उम्र में जब उन्होंने पहली बार हाथ में तंबूरा उठाया था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन यह तंबूरा देश-विदेश के बड़े-बड़े मंचों की शान बनेगा। लेकिन 70 साल की उम्र में 5 जुलाई 2026 को हमेशा के लिए शांत हो गईं। उनके चले जाने से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस महान कलाकार को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि दी है।
तीजनबाई की पंडवानी कला का जादू कुछ ऐसा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उनकी मुरीद हो गई थीं। एक कार्यक्रम के दौरान जब इंदिरा गांधी ने उनके गायन से प्रभावित होकर कहा कि आप बहुत शानदार महाभारत कथा सुनाती हैं, तो तीजनबाई ने बिना झिझके बेहद तपाक से जवाब दिया था, "मैं महाभारत नहीं करती, बल्कि महाभारत की कथा सुनाती हूं।" यह वाकया उनकी बेबाकी और अपनी कला के प्रति उनके गहरे सम्मान को दिखाता है।
तीजनबाई के लिए पंडवानी का यह सफर कांटों भरा रहा। जिस दौर में उन्होंने गाना शुरू किया, उस समय किसी महिला का मंच पर आकर महाभारत की कथा सुनाना समाज को मंजूर नहीं था। इसके लिए उन्हें अपनों और समाज के अनगिनत ताने सुनने पड़े। विरोध इस हद तक बढ़ा कि उन्हें खुद के घर से निकाल दिया गया।
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पंडवानी के प्रति उनके जुनून की वजह से उनकी पहली शादी टूट गई। यहाँ तक कि उनकी दूसरी शादी भी इसी वजह से टूटने की कगार पर पहुँच गई थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनके रग-रग में पंडवानी बसी थी और वह आखिरी सांस तक अपनी कला के लिए जीती रहीं।
उनकी जिंदगी से जुड़ा एक बेहद कड़ा किस्सा है, जब छत्तीसगढ़ में एक मंच पर प्रस्तुति के दौरान उनके पति ने गुस्सा होकर अभद्र भाषा में उनकी कला पर कड़ा ऐतराज जताया था। तीजनबाई ने उस अपमान को सहने के बजाय अपने तंबूरे को ऊपर उठाया और गरजती हुई आवाज में कहा कि तुमने सिर्फ मेरा नहीं, बल्कि मेरी कला और इस पवित्र मंच का अपमान किया है। तुम माफी के लायक नहीं हो और आज से तुम मेरे कोई नहीं हो। इसके बाद उन्होंने पति से हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया।
तीजनबाई की असाधारण प्रतिभा को सबसे पहले देश के प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना। उन्होंने भोपाल के भारत भवन से तीजनबाई को पंडवानी गाने का न्यौता दिया, जहाँ दोनों की पहली मुलाकात हुई। हबीब तनवीर उनके गायन, मंच पर उनकी गर्जना और उनके बेमिसाल अभिनय से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तीजनबाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने परफॉर्म करने का ऐतिहासिक मौका दिलवाया।
मशहूर फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल भी तीजनबाई के हुनर के दीवाने हो गए थे। उन्होंने अपने प्रसिद्ध दूरदर्शन धारावाहिक 'भारत एक खोज' में महाभारत प्रसंग के लिए तीजनबाई को विशेष रूप से आमंत्रित किया। इस धारावाहिक के माध्यम से उनकी कला देश के कोने-कोने और हर घर तक पहुँच गई। इसके बाद, साल 1986 में भिलाई स्टील प्लांट ने उनकी अद्भुत प्रतिभा को सम्मान देते हुए उन्हें नौकरी दी।
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तीजनबाई ने देश-विदेश के अनगिनत मंचों पर अपनी कला का लोहा मनवाया और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का गौरवपूर्ण प्रतिनिधित्व किया। वह छत्तीसगढ़ की पहली ऐसी महिला कलाकार बनीं, जिन्हें देश के बेहद प्रतिष्ठित सम्मान 'पद्म विभूषण' से नवाजा गया। उन्होंने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का काम किया।
तीजनबाई ने महज 13 साल की उम्र में अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक पर दी थी। इस पहली प्रस्तुति के बाद ही आस-पास के गांवों में उनकी कला की चर्चा होने लगी। इसके बाद उन्हें भिलाई के एक कार्यक्रम में शहर में गाने का पहला मौका मिला, जिसके बाद उन्होंने भोपाल, दुर्ग, रायपुर से होते हुए पूरी दुनिया को अपना मुरीद बना लिया।
उन्हें वाद्ययंत्रों के साथ पंडवानी गाने का हुनर उनके गुरु उमेद सिंह देशमुख ने सिखाया था, जिन्हें वे आदर और प्रेम से 'ददा' कहकर पुकारती थीं।
तीजनबाई पंडवानी की 'कापालिक शैली' की सबसे बड़ी और लोकप्रिय कलाकार थीं। इस शैली की खासियत यह है कि इसमें कलाकार सिर्फ कहानी नहीं सुनाता, बल्कि मंच पर उन किरदारों को खुद जीता है। तीजनबाई जब मंच पर आती थीं, तो अपनी दमदार आवाज और चेहरे के हाव-भाव से भीम, अर्जुन, द्रौपदी और दुर्योधन जैसे पात्रों को जीवंत कर देती थीं।
मंच पर अभिनय करते समय उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, तो कभी अर्जुन का धनुष। उनकी ऊर्जा और लोकभाषा, स्थानीय मुहावरों व हास्य के अनूठे तालमेल ने पंडवानी को हर वर्ग के लिए बेहद सरल और पसंदीदा बना दिया। यही वजह रही कि उनकी कला सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, स्विट्जरलैंड, तुर्की और मॉरीशस जैसे देशों में भी जमकर सराही गई। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पंडवानी के रूप में वह हमेशा अमर रहेंगी।
Location : Raipur
Published : 5 July 2026, 2:19 PM IST
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