Seema Anand: कामसूत्र से आधुनिक समाज तक, आनंद और आत्मनिर्णय पर सीमा आनंद की खुली बातचीत

सेक्स एजुकेटर और लेखिका सीमा आनंद ने अपनी नई किताब ‘स्पीक ईजी’ पर चर्चा करते हुए सोशल मीडिया ट्रोलिंग, डिजिटल साक्षरता और समाज में महिलाओं की भूमिका जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।

Post Published By: Mayank Tawer
Updated : 7 March 2026, 12:15 AM IST

New Delhi: एक मंच पर ऐसी बातचीत हुई, जिसने सोशल मीडिया, ट्रोलिंग और समाज की सोच पर कई तीखे सवाल खड़े कर दिए। मशहूर सेक्स एजुकेटर और लेखिका सीमा आनंद ने अपनी नई किताब ‘स्पीक ईजी’ (Speak Easy) पर खुलकर बात की और बताया कि आज के डिजिटल दौर में सच बोलना कई बार कितना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर बढ़ती नफरत और ट्रोलिंग अब सिर्फ पब्लिक फिगर्स ही नहीं बल्कि आम लोगों के लिए भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

खुद झेली ट्रोलिंग, लेना पड़ा ब्रेक

सीमा आनंद ने अपना निजी अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि सेक्स और रिश्तों जैसे विषयों पर खुलकर बात करने की वजह से उन्हें ऑनलाइन ट्रोलिंग और धमकियों का सामना करना पड़ा। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि उन्हें कुछ समय के लिए सोशल मीडिया से दूरी बनानी पड़ी। उनके मुताबिक, आज ट्रोलिंग एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है और इससे अलग-अलग उम्र के साथ पेशे के लोग प्रभावित हो रहे हैं।

बच्चों को सिखानी होगी डिजिटल समझ

सीमा आनंद ने डिजिटल साक्षरता की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्कूल और कॉलेज के छात्रों को यह सिखाना बेहद जरूरी है कि ऑनलाइन बदतमीजी या बुलीइंग का सामना कैसे किया जाए। उनके अनुसार, बच्चों को यह समझना होगा कि नफरत भरे कमेंट्स का जवाब कैसे दिया जाए और डिजिटल दुनिया में मानसिक रूप से मजबूत कैसे रहा जाए। उनका मानना है कि आने वाले समय में यह कौशल शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।

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क्यों लिखी ‘स्पीक ईजी’

सीमा आनंद ने अपनी किताब लिखने की वजह भी साझा की। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया की 60 सेकंड की रील्स किसी मुद्दे पर चर्चा तो शुरू कर सकती हैं, लेकिन उनमें गहराई नहीं होती। कई बार लोग पूरी बात समझे बिना ही प्रतिक्रिया दे देते हैं। इसी कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने ‘स्पीक ईजी’ लिखी, ताकि जटिल और गंभीर विषयों पर विस्तार से और सही संदर्भ में चर्चा हो सके।

समाज और महिलाओं की भूमिका पर विचार

चर्चा के दौरान सीमा आनंद ने समाज में महिलाओं की छवि पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अक्सर “अच्छी महिला” को चुप और आज्ञाकारी माना जाता है। कहानियां और परंपराएं महिलाओं की जिम्मेदारियां तो तय करती हैं। लेकिन उनके शरीर, इच्छा और आत्मनिर्णय की बात कम करती हैं। उन्होंने बताया कि मातृत्व के शुरुआती दौर में उन्हें यह एहसास हुआ कि महिलाओं के आनंद और स्वतंत्रता की कहानियां मुख्यधारा में लगभग गायब हैं।

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शास्त्रों और साहित्य में रूपकों की परंपरा

सीमा आनंद ने कहा कि इसी सवाल ने उन्हें कामसूत्र जैसे प्राचीन ग्रंथों को नए नजरिये से पढ़ने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में कामसूत्र पढ़कर उन्हें खास प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर उन्हें संस्कृत साहित्य में रूपकों की समृद्ध परंपरा दिखाई दी। उन्होंने बताया कि दो हजार साल से भी ज्यादा समय से साहित्य में इन रूपकों का इस्तेमाल होता रहा है। कालिदास से लेकर भानुदत्त तक कई लेखकों ने इस संवेदनशील भाषा को अपने लेखन में जगह दी। छठी से आठवीं सदी के प्रेम आख्यानों में भी यह झलकता है, जिससे पता चलता है कि उस समय आनंद को बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। बातचीत के अंत में उन्होंने मुस्कराते हुए खुद को “पैट्रन सेंट ऑफ प्लेजर” भी कहा।

Location : 
  • New Delhi

Published : 
  • 7 March 2026, 12:15 AM IST