
IAS दीपांशु जिंदल (Img- Instagram)
New Delhi: सफलता की हर चमकती तस्वीर के पीछे अक्सर आंसुओं और संघर्षों की एक अनकही कहानी छिपी होती है। पंजाब के मोगा जिले के रहने वाले दीपांशु जिंदल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यह केवल एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने की खबर नहीं है, बल्कि उस अदम्य साहस और जिद की मिसाल है जिसने जिंदगी के सबसे गहरे अंधेरे को उम्मीद के उजाले में बदल दिया।
माता-पिता का साया अचानक सिर से उठने के बाद दीपांशु के जीवन में केवल खामोशी और अकेलापन बचा था, लेकिन उन्होंने अपने दुखों को कमजोरी बनाने के बजाय माता-पिता के सपनों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।
दीपांशु का बचपन सामान्य था। उनके पिता एक इंजीनियर थे और मां गृहिणी थीं। जब वे 12वीं कक्षा में थे, तब उनके पिता को कैंसर का पता चला। एक तरफ पिता का इलाज और दूसरी तरफ बोर्ड परीक्षा की तैयारी, दीपांशु ने दोनों को संभाला। आगे चलकर उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित SRCC कॉलेज में दाखिला लिया और वहां गोल्ड मेडल भी जीता।
लेकिन जब वे कॉलेज के पहले ही सेमेस्टर में थे, तब उनके पिता का निधन हो गया। दुखों का पहाड़ अभी टूटा ही था कि महज 2 महीने बाद उनकी माताजी भी चल बसीं। घर का सन्नाटा और अपनों को खोने का गम किसी को भी तोड़ सकता था, और दीपांशु भी अंदर से बिखर गए थे।
कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया घरों में बंद थी, तब दीपांशु अपने घर में बिल्कुल अकेले थे। वह दौर उनके लिए किसी कठिन अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। इस मुश्किल समय में उनकी बड़ी बहन उनके लिए ढाल बनकर खड़ी हुईं।
उनसे 5 साल बड़ी बहन, जो खुद भी एक IAS अधिकारी हैं, ने दीपांशु को संभाला और उनका हौसला बढ़ाया। दीपांशु अपनी बहन को ही अपना आदर्श मानते हैं। बहन के मार्गदर्शन और माता-पिता को दिए वादे ने दीपांशु के भीतर सिविल सेवा में जाने की लौ को फिर से जला दिया।
UPSC की राह कभी आसान नहीं होती। माता-पिता के बिना मानसिक और भावनात्मक संघर्षों से जूझते हुए दीपांशु ने कोचिंग जॉइन की। हालांकि, शुरुआती दो प्रयासों में उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा। बार-बार मिलने वाली असफलता और अकेलापन किसी को भी निराश कर सकता था, लेकिन दीपांशु ने हार नहीं मानी।
उन्होंने अपनी कमियों को समझा, अपनी रणनीति सुधारी और दोगुनी मेहनत के साथ तीसरे प्रयास में उतर गए। आखिरकार, यूपीएससी परीक्षा में उन्होंने ऑल इंडिया 38वीं रैंक (AIR 38) हासिल कर अपना और अपने माता-पिता का सपना पूरा किया।
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अपनी इस ऐतिहासिक सफलता के बाद दीपांशु का मानना है कि जीवन में दुखों से भागने के बजाय उन्हें अपनी ताकत में बदलना सीखना चाहिए। सिविल सेवा या किसी भी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं को संदेश देते हुए वे कहते हैं "सफलता के पीछे भागने के बजाय खुद को इतना काबिल बनाइए कि सफलता खुद आपके पास चलकर आए। काबिल बनिए, इच्छा अपने आप पूरी हो जाएगी।" दीपांशु का यह सफर साबित करता है कि यदि नीयत साफ हो और इरादा मजबूत, तो जिंदगी की कोई भी चुनौती आपको मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।
Location : New Delhi
Published : 3 August 2026, 12:10 PM IST