एक डिग्री पर 10 नौकरियां! यूपी में शिक्षक भर्ती की जांच तेज, STF करेगी दस्तावेजों की पड़ताल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के परिषदीय स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक के शिक्षकों के शैक्षिक प्रमाणपत्रों और नियुक्ति पत्रों की जांच के निर्देश दिए हैं। STF जांच करेगी, जबकि लापरवाही पर अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सकती है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 18 October 2026, 6:07 PM IST

Prayagraj: उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक नियुक्तियों की पारदर्शिता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। एक ही शैक्षिक प्रमाणपत्र के आधार पर 10 या उससे अधिक लोगों की नियुक्ति किए जाने के आरोपों के बीच अदालत ने कक्षा 1 से 8 तक के परिषदीय विद्यालयों में तैनात सभी शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच के निर्देश दिए हैं। शिक्षकों को औपचारिक सूचना मिलने के एक सप्ताह के भीतर अपने शैक्षिक प्रमाणपत्र और नियुक्ति पत्र संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) कार्यालय में जमा करने होंगे। जांच में विशेष जांच दल (STF) की भूमिका भी अहम होगी।

यह मामला केवल प्रमाणपत्रों के सत्यापन तक सीमित नहीं है। अदालत ने जांच प्रक्रिया में देरी और लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही पर भी जोर दिया है। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर हैं कि जिलों में दस्तावेजों की जांच किस तरह होती है और संदिग्ध नियुक्तियों के मामलों में क्या कार्रवाई की जाती है।

एक प्रमाणपत्र पर 10 नियुक्तियों का मामला कैसे आया सामने?

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान STF की ओर से पेश जानकारी में कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी हासिल करने के मामले सामने आए। जांच से जुड़े प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, कुछ मामलों में एक ही शैक्षिक प्रमाणपत्र का इस्तेमाल 10 या उससे अधिक लोगों की नियुक्तियों के लिए किए जाने की आशंका जताई गई।

इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने जांच का दायरा व्यापक करते हुए सभी संबंधित शिक्षकों के शैक्षिक दस्तावेजों और नियुक्ति पत्रों की पड़ताल का निर्देश दिया। हालांकि, व्यापक सत्यापन का आदेश दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि सभी शिक्षकों की नियुक्तियां संदिग्ध हैं। जांच का उद्देश्य वास्तविक दस्तावेजों और कथित अनियमितताओं के बीच अंतर स्पष्ट करना है।

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एक सप्ताह में जमा करने होंगे शैक्षिक दस्तावेज

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने निर्देश दिया है कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षक अपने शैक्षिक प्रमाणपत्र और नियुक्ति संबंधी दस्तावेज संबंधित BSA कार्यालय में जमा करें।

इसमें हाईस्कूल, इंटरमीडिएट, स्नातक और अन्य प्रासंगिक शैक्षिक योग्यताओं के प्रमाणपत्रों की प्रतियां तथा मूल नियुक्ति आदेश शामिल हैं। शिक्षकों को यह भी बताना होगा कि उनके किसी करीबी रिश्तेदार ने बेसिक शिक्षा विभाग में BSA या उससे उच्च पद पर वर्तमान में काम किया है या सेवानिवृत्त हुआ है या नहीं। इसके लिए नोटरीकृत शपथपत्र देने का निर्देश भी दिया गया है।

अदालत का जोर इस प्रक्रिया को केवल औपचारिकता बनाकर पूरा करने के बजाय दस्तावेजों की वास्तविकता की जांच करने पर है।

BSA से लेकर STF तक तय होगी जिम्मेदारी

जांच प्रक्रिया में जिला स्तर पर बेसिक शिक्षा अधिकारियों को शिक्षकों के नाम, शैक्षिक योग्यता और नियुक्ति से संबंधित विवरण का रिकॉर्ड तैयार करना होगा। इन विवरणों को संबंधित क्षेत्रीय STF कार्यालयों तक पहुंचाया जाएगा, ताकि दस्तावेजों का सत्यापन और संदिग्ध नियुक्तियों की जांच की जा सके।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि निर्देशों के पालन में लापरवाही, अनावश्यक देरी या जांच को प्रभावी ढंग से लागू नहीं करने पर जिम्मेदार शिक्षा अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो सकती है।

यहीं से इस मामले का प्रशासनिक पहलू जरूरी हो जाता है। अगर किसी नियुक्ति में दस्तावेजों की गड़बड़ी सामने आती है, तो यह भी जांच का विषय होगा कि नियुक्ति के समय प्रमाणपत्रों का सत्यापन कैसे हुआ और संबंधित स्तर पर निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया या नहीं।

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गोरखपुर की शिक्षिका से जुड़े मामले से शुरू हुई कार्रवाई

यह कार्रवाई कुसुमलता नाम की याचिकाकर्ता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों के बाद हुई। मामले में STF की ओर से बताया गया कि गोरखपुर जिले के कौड़ीराम क्षेत्र के बैरीपार कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय में तैनात सहायक अध्यापिका कुसुमलता श्रीवास्तव के शैक्षिक दस्तावेजों का कथित तौर पर दूसरे लोगों ने नौकरी हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया।

अदालत को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता 12 और 13 अक्टूबर को निर्धारित भौतिक सत्यापन के लिए STF के समक्ष पेश नहीं हुई थीं और आवश्यक शैक्षिक दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए गए थे। इसके बाद अदालत ने जांच को व्यापक बनाने के निर्देश दिए।

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अब प्रशासन के सामने क्या है चुनौती?

हाईकोर्ट के आदेश के बाद शिक्षा विभाग और जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बड़े स्तर पर दस्तावेजों का सत्यापन समयबद्ध तरीके से पूरा करना है। अलग-अलग राज्यों और विश्वविद्यालयों से जारी प्रमाणपत्रों की पुष्टि, नियुक्ति रिकॉर्ड का मिलान और संदिग्ध मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया जांच को जटिल बना सकती है।

इस मामले में प्रशासनिक जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जांच के दौरान यह स्पष्ट होना चाहिए कि कहीं नियुक्ति प्रक्रिया में निर्धारित नियमों की अनदेखी तो नहीं हुई और यदि ऐसा हुआ, तो किस स्तर पर लापरवाही बरती गई।

इस पूरी कार्रवाई का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी विद्यालयों में नियुक्तियां वैध शैक्षिक योग्यता और निर्धारित नियमों के अनुरूप हों। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दस्तावेजों की जांच से कितने संदिग्ध मामले सामने आते हैं और संबंधित विभाग उनके निस्तारण के लिए क्या कदम उठाता है।

Location :  Prayagraj

Published :  18 October 2026, 6:07 PM IST