बेटे की जिंदगी बचाने को मां ने दे दी किडनी, ट्रांसप्लांट के बाद फेल हुआ अंग; अब हर तीसरे दिन 3 हजार जुटा रहा परिवार

बिजनौर के नजीबाबाद निवासी अल्ताफ की जिंदगी बचाने के लिए उसकी मां ने अपनी किडनी दान कर दी। अक्टूबर 2025 में मोहाली के एक निजी अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट हुआ, लेकिन परिवार के मुताबिक बाद में प्रत्यारोपित किडनी फेल हो गई। अब अल्ताफ को हर तीसरे दिन डायलिसिस की जरूरत पड़ रही है। इलाज के खर्च में परिवार एक बीघा जमीन तक बेच चुका है।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 17 August 2026, 2:20 PM IST

Bijnor: जिस बेटे को मां ने जन्म दिया, उसकी जिंदगी बचाने के लिए जब किडनी देने की बारी आई तो उसने एक पल भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मां ने अपनी किडनी बेटे को दान कर दी। परिवार को उम्मीद थी कि ट्रांसप्लांट के बाद अल्ताफ की जिंदगी फिर पटरी पर लौट आएगी। लेकिन ऑपरेशन के कुछ समय बाद ही हालात बिगड़ने लगे। परिवार के मुताबिक, प्रत्यारोपित किडनी ने काम करना बंद कर दिया और अब अल्ताफ को हर तीसरे दिन डायलिसिस करानी पड़ रही है।

बिजनौर के नजीबाबाद तहसील के रहने वाले अल्ताफ की कहानी इस समय चंडीगढ़ के PGI के बाहर खड़े उसके पिता शाहिद की आंखों में साफ दिखाई देती है। कभी अबू धाबी में ड्राइवर की नौकरी करने वाला अल्ताफ आज बीमारी और इलाज के खर्च के बीच जिंदगी की जंग लड़ रहा है। परिवार का कहना है कि इलाज में अब तक करीब 9.5 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं और एक बीघा जमीन भी बेचनी पड़ी है।

पांच साल अबू धाबी में ड्राइवर रहा अल्ताफ

अल्ताफ उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की नजीबाबाद तहसील का रहने वाला है। परिवार के मुताबिक, उसने करीब पांच साल तक अबू धाबी में ड्राइवर के तौर पर काम किया। शुरुआत में उसकी मासिक कमाई करीब 20 हजार रुपये थी, जबकि भारत लौटने के समय वह करीब 25 हजार रुपये महीना कमा रहा था। अल्ताफ की शादी हो चुकी है, लेकिन उसके कोई बच्चा नहीं है। परिवार के लिए वह कमाने वाला सदस्य था और विदेश में नौकरी कर अपने परिवार की जिम्मेदारियां संभाल रहा था।

पैर में दर्द से शुरू हुई परेशानी

परिवार के मुताबिक, एक दिन अचानक अल्ताफ के पैर में दर्द होने लगा। इसके बाद पैर में सूजन आ गई। अबू धाबी में उसका इलाज कराया गया, लेकिन समस्या पूरी तरह ठीक नहीं हुई। बाद में उसे डिस्चार्ज कर दिया गया और परिवार उसे भारत वापस ले आया। बिजनौर में जांच कराई गई तो पता चला कि उसकी किडनी में गंभीर समस्या है। डॉक्टरों ने आगे इलाज और किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत बताई।

बिजनौर में एक छोटी सी लापरवाही ने ली महिला की जान, सिर हुआ धड़ से अलग, परिजनों में कोहराम

मां ने अपनी किडनी देने का लिया फैसला

जब बेटे की जिंदगी बचाने की बात आई तो मां शेरूनिका ने अपनी किडनी देने का फैसला किया। परिवार के मुताबिक, ट्रांसप्लांट से पहले शेरूनिका की किडनी में पथरी थी। पिता शाहिद का कहना है कि उन्होंने डॉक्टरों को इस बारे में जानकारी भी दी थी। इसके बावजूद परिवार ने बेटे के इलाज की उम्मीद नहीं छोड़ी। मां अपने बेटे की जिंदगी बचाने के लिए किडनी दान करने को तैयार हो गईं।

अक्टूबर 2025 में मोहाली में हुआ ट्रांसप्लांट

परिवार के मुताबिक, अक्टूबर 2025 में मोहाली के एक निजी अस्पताल में अल्ताफ का किडनी ट्रांसप्लांट कराया गया। इस इलाज में करीब सात लाख रुपये खर्च हुए। ऑपरेशन के बाद परिवार को लगा कि अब अल्ताफ की तबीयत धीरे-धीरे सुधरेगी और वह सामान्य जिंदगी जी सकेगा।

हालत बिगड़ी तो PGI लेकर पहुंचे

जब अल्ताफ की हालत लगातार बिगड़ने लगी तो परिवार उसे जुलाई 2026 में चंडीगढ़ स्थित PGI लेकर पहुंचा। वहां वह करीब आठ दिन तक भर्ती रहा। इलाज के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया, लेकिन उसकी परेशानी खत्म नहीं हुई। डॉक्टरों की निगरानी और इलाज के बावजूद उसे लगातार डायलिसिस की जरूरत बनी हुई है।

5 लाख का मुआवजा चाहिए… चाहे मां की जान ही क्यों न चली जाए! बिजनौर की वारदात ने झकझोरा

500 रुपये की डायलिसिस के लिए भी नंबर का इंतजार

परिवार के मुताबिक, PGI में डायलिसिस की सुविधा कम खर्च में मिल जाती है। वहां एक डायलिसिस के लिए करीब 500 रुपये देने पड़ते हैं, लेकिन मरीजों की संख्या ज्यादा होने के कारण हर बार नंबर मिलना आसान नहीं है। जब PGI में नंबर नहीं आता तो परिवार को मजबूरी में बाहर के सेंटर का रुख करना पड़ता है। वहां एक डायलिसिस पर करीब तीन हजार रुपये खर्च होते हैं।

बेटे को किडनी देने के बाद मां भी बीमार

जिस मां ने बेटे की जिंदगी बचाने के लिए अपनी किडनी दान की, अब उनकी अपनी तबीयत भी ठीक नहीं रहती। परिवार के मुताबिक, शेरूनिका को अक्सर पेट में दर्द रहता है और बीच-बीच में बुखार भी आता है। एक तरफ बेटे का इलाज लगातार जारी है तो दूसरी तरफ मां की सेहत भी परिवार के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। पिता शाहिद दोनों की देखभाल कर रहे हैं।

जमीन बेचकर भी नहीं खत्म हुई परेशानी

अल्ताफ के इलाज का खर्च लगातार बढ़ता गया। परिवार के मुताबिक, ट्रांसप्लांट और उसके बाद के इलाज में करीब 9.5 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। इलाज का खर्च जुटाने के लिए परिवार को अपनी एक बीघा जमीन तक बेचनी पड़ी। अब भी इलाज खत्म नहीं हुआ है। हर तीसरे दिन डायलिसिस का खर्च सामने खड़ा रहता है।

Location :  Bijnor

Published :  17 August 2026, 2:20 PM IST