वाराणसी की पहचान सिर्फ मंदिर और घाट नहीं, बल्कि वे लोग हैं जो सदियों से इसकी परंपराओं को निभाते आएं हैं। काशी में हर दिन गंगा बहती है, आरती होती है, लेकिन उसी के साथ कई लोक परंपराएं दम तोड़ रही हैं। डाइनामाइट न्यूज़ पर पढ़िए ये खास रिपोर्ट…

वाराणसी की पहचान सिर्फ मंदिर और घाट नहीं! (फोटो सोर्स- डाइनामाइट न्यूज़)
Varanasi: जिसे दुनिया मोक्ष की नगरी कहती है। जहां हर सुबह गंगा की लहरों के साथ मंत्रोच्चार गूंजता है, हर शाम आरती की लौ जलती है और हर गली में इतिहास सांस लेता है। लेकिन इस प्राचीन शहर की आत्मा केवल मंदिरों, घाटों और गलियों में नहीं बसती, बल्कि उन लोक परंपराओं और पारंपरिक पेशों में भी समाई है, जो पीढ़ियों से इस शहर को जीवित रखते आए हैं।
आज वही परंपराएं, वही लोग, वही पेशे चुपचाप इतिहास के पन्नों में गुम होते जा रहे हैं- बिना शोर, बिना चर्चा और बिना दस्तावेजीकरण के।
कभी बनारस की सुबह शंखनाद के बिना अधूरी मानी जाती थी। मंदिरों, घाटों और पूजा स्थलों पर शंख फूंकने वाले धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न हिस्सा थे। शंखनाद को वैदिक परंपरा में पवित्रता, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है।
पंडितों के अनुसार, शंख फूंकना केवल सांस का काम नहीं, बल्कि एक विशेष साधना और अभ्यास है। लेकिन आज वाराणसी में ऐसे पारंपरिक शंख वादकों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक रह गई है। कई मंदिरों में अब रिकॉर्डेड शंखध्वनि या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल हो रहा है।
एक 70 वर्षीय शंख वादक बताते हैं- "हमारे पिता और दादा यही काम करते थे। लेकिन आज की पीढ़ी को इसमें न रोजगार दिखता है, न सम्मान।"
प्रतीकात्मक छवि (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
वाराणसी सदियों से संस्कृत शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र रही है। काशी के घाटों पर बैठकर शास्त्रों का पाठ करने वाले विद्वान केवल पंडित नहीं थे, वे चलती-फिरती पाठशालाएं थे। सुबह के समय दशाश्वमेध, अस्सी और पंचगंगा घाटों पर वेद, उपनिषद, गीता और रामायण के श्लोक गूंजते थे। देश-विदेश से आए विद्यार्थी और श्रद्धालु उनसे ज्ञान ग्रहण करते थे।
लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा भी सिमटती चली जा रही है क्योंकि अब संस्कृत पढ़ने वाले छात्रों की संख्या घट रही है, पहले की अपेक्षा गुरुकुल प्रणाली भी कमजोर हो गई है और आर्थिक असुरक्षा बढ़ गई है।
आज कई विद्वान दक्षिणा के भरोसे जीवन गुजार रहे हैं। नई पीढ़ी इस पेशे को अपनाने से कतरा रही है।
काशी की पहचान केवल मंदिरों से नहीं, बल्कि उन पर की गई बारीक नक्काशी से भी है। लकड़ी, पत्थर और पीतल पर काम करने वाले पारंपरिक कारीगरों ने सदियों तक बनारस की वास्तुकला को जीवंत रखा।
जानकार बताते हैं कि काशी की नक्काशी शैली अलग पहचान रखती है-
लेकिन आज मशीन से बनी सस्ती डिजाइन ने इन कारीगरों को हाशिये पर धकेल दिया है। कई नक्काशीकारों ने यह पेशा छोड़कर दिहाड़ी मजदूरी शुरू कर दी है।
काशी के वो लोग जो नक्काशी करते थे (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
वाराणसी और गंगा- दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। और गंगा पर चलने वाली लकड़ी की पारंपरिक नावें, कभी काशी की जीवनरेखा हुआ करती थीं। नाव बनाना केवल लकड़ी जोड़ना नहीं था, बल्कि यह पीढ़ियों का अनुभव, नदी के स्वभाव की समझ, मौसम और बहाव का ज्ञान हुआ करती थी।
लेकिन आज फाइबर और मोटर बोट्स के बढ़ते चलन ने इन नाव निर्माताओं को लगभग खत्म कर दिया है। लकड़ी महंगी है, मेहनत ज्यादा है और मुनाफा कम।
एक नाव निर्माता कहते हैं- "हमारे बेटे इस काम में भविष्य नहीं देखते, और शायद वे गलत भी नहीं हैं।"
आधुनिकता और मशीनों के दौर में काशी (फोटो सोर्स- इंटरनेट)
जानकारों और स्थानीय लोगों के अनुसार इसके मुख्य कारण हैं- आधुनिकता और तकनीक का दबाव, आर्थिक असुरक्षा, सरकारी संरक्षण की कमी, नई पीढ़ी का पलायन। विडंबना यह है कि जिन परंपराओं को देखने लोग विदेशों से आते हैं, वही परंपराएं अपने ही शहर में नजरअंदाज की जा रही हैं।
काशी की ये लोक परंपराएं केवल अतीत की याद नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर हैं। अगर आज इन्हें दर्ज नहीं किया गया, संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल किताबों या तस्वीरों में देखेंगी। जरूरत है- सरकारी संरक्षण की, रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन की, मीडिया की गंभीर भूमिका की और समाज की संवेदनशीलता की।
वाराणसी का भविष्य जितना उज्ज्वल दिखता है, उसका अतीत उतना ही नाजुक हो चुका है। अगर आज भी इन गुमनाम कारीगरों, विद्वानों और परंपराओं की आवाज नहीं सुनी गई, तो काशी सिर्फ एक पर्यटन स्थल बनकर रह जाएगी- अपनी आत्मा खोकर।