स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तीखा हमला बोला और कहा कि राज्य में योगी जैसा सीएम नहीं होना चाहिए। उनका धरना मौनी अमावस्या के बाद से जारी है। स्वामी ने योगी शासन की तुलना मुगलों से की और कहा कि केशव प्रसाद मौर्य को सीएम होना चाहिए।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बड़ा बयान
Prayagraj: उत्तर प्रदेश में मौनी अमावस्या के बाद से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का धरना जारी है। स्वामी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तीखा हमला बोला और कहा कि योगी जैसा मुख्यमंत्री नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने योगी शासन की तुलना मुगलों के शासन से करते हुए प्रशासनिक निर्णयों और नीतियों पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि राज्य की जनता के लिए बेहतर प्रशासन और विकास की आवश्यकता है, जिसे वर्तमान सरकार पूरी तरह नहीं निभा रही।
धरना स्थल पर मीडिया से बातचीत में स्वामी ने जोर देकर कहा कि उनका उद्देश्य केवल सरकार को आलोचना करना नहीं है, बल्कि राज्य में न्याय और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। अधिकारियों के अनुसार, स्वामी का धरना मौनी अमावस्या के बाद से लगातार जारी है और उन्होंने इसे तब तक खत्म नहीं करने का ऐलान किया जब तक उनकी मांगे पूरी नहीं होतीं।
बता दें कि ज्योतिष मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने स्पष्ट शब्दों में कहा है था कि वो वसंत पंचमी के पावन स्नान पर्व पर भी संगम में स्नान नहीं करेंगे। उनका यह निर्णय मौनी अमावस्या के दिन स्नान से रोके जाने की घटना के बाद लिया गया, जिससे वे गहराई से आहत बताए जा रहे हैं।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर में कहा कि प्रशासन का व्यवहार उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक रहा है। उन्होंने साफ कहा कि जब तक प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता और उन्हें ससम्मान संगम स्नान कराकर शिविर में प्रवेश नहीं कराया जाता, तब तक वे अपने निर्णय पर अडिग रहेंगे। उनके अनुसार यह कोई विशेष सुविधा की मांग नहीं, बल्कि संत समाज और सनातन परंपरा के सम्मान का प्रश्न है।
अपने बयान में शंकराचार्य ने यह भी कहा कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो वे हर वर्ष माघ मेले में आकर फुटपाथ पर ही बैठेंगे। उन्होंने इसे जिद नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का विषय बताया। उनके इस बयान के बाद मेला क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है और संत समाज के बीच इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।