
इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Img: Pinterest)
Allahabad: उत्तर प्रदेश के जनपद प्रयागराज में क्या माता-पिता होने का अधिकार इतना बड़ा है कि बालिग बेटी को उसकी इच्छा के खिलाफ अपने साथ रहने के लिए मजबूर किया जा सके? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में साफ किया कि बालिग व्यक्ति के अपने जीवन और रहने के फैसले में उसकी इच्छा सर्वोपरि है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई बालिग महिला अपनी मर्जी से कहीं रह रही है और किसी अवैध हिरासत में नहीं है, तो उसे माता-पिता के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
यह मामला मऊ की रहने वाली एक महिला की याचिका से जुड़ा है। याची मां ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर अपनी 25 वर्षीय बेटी को कोर्ट में पेश कराने और उसके साथ रहने की अनुमति देने की मांग की थी। मामले में कोर्ट के आदेश के बाद घोसी थाने की पुलिस ने महिला की बेटी को अदालत के सामने पेश किया। इसके बाद कोर्ट ने उससे बातचीत कर उसकी इच्छा और परिस्थितियों के बारे में जानकारी ली।
कोर्ट के सामने पेश हुई 25 वर्षीय महिला ने स्पष्ट रूप से बताया कि वह दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही है। उसने अपनी मां के साथ रहने से भी इनकार कर दिया। महिला के बयान के बाद कोर्ट ने उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि जब कोई बालिग अपने निवास को लेकर स्पष्ट और स्वतंत्र फैसला लेता है तो उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की प्रकृति को भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी याचिका का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध या गैरकानूनी हिरासत से मुक्त कराना है। इसका सामान्य रूप से इस्तेमाल किसी बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ किसी खास व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर करने के लिए नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बालिग को केवल इसलिए उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि वह व्यक्ति उसका माता-पिता है। अदालत ने माना कि बालिग व्यक्ति अपने निवास और निजी जीवन को लेकर स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार रखता है। ऐसे फैसले में उसकी इच्छा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जब तक उसके खिलाफ किसी गैरकानूनी हिरासत जैसी स्थिति सामने न आए।
मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ कहीं रखा गया है या वह किसी अवैध हिरासत में है। इसके विपरीत, महिला ने कोर्ट के सामने खुद बताया कि वह दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने मां की ओर से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता और स्वतंत्र इच्छा को अहम माना है। अदालत की टिप्पणी का सीधा अर्थ यह है कि बालिग महिला अगर अपनी इच्छा से अलग रह रही है और किसी अवैध हिरासत में नहीं है, तो केवल माता-पिता की इच्छा के आधार पर उसे उनके साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
Location : Allahabad
Published : 4 October 2026, 5:04 PM IST
Topics : Adult Daughter Rights Allahabad HC Judgement Allahabad High Court Habeas Corpus Petition Legal News India