मोबाइल की लत और ऑनलाइन खतरे: बच्चों की डिजिटल दुनिया का असली जिम्मेदार कौन?

बच्चों में बढ़ती मोबाइल की लत और ऑनलाइन खतरों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। बच्चों को इंटरनेट से दूर रखने के बजाय उन्हें सुरक्षित डिजिटल आदतें सिखाना क्यों जरूरी है? जानिए इस स्पेशल रिपोर्ट में।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 26 October 2026, 4:02 PM IST

New Delhi: आज के समय में तकनीक हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है, लेकिन इसका सबसे गंभीर असर बच्चों पर पड़ रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट के अधिकार और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक अहम टिप्पणी की है, जिसने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर बच्चों की इस डिजिटल दुनिया का असली जिम्मेदार कौन है।

शुरुआत कार्टून से और लत पर आकर खत्म

अक्सर इसकी शुरुआत बहुत साधारण तरीके से होती है। माता-पिता अपने काम में व्यस्त होते हैं और रोते या परेशान करते बच्चे को चुप कराने के लिए उसके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। धीरे-धीरे यह मजबूरी रोज की आदत बन जाती है।

अब हाल यह है कि खाना खाने से लेकर सोने तक, हर काम के लिए बच्चों को मोबाइल चाहिए। यदि फोन छीन लिया जाए, तो वे तुरंत रोने और जिद करने लगते हैं। कई ऐप्स और प्लेटफॉर्म्स को डिज़ाइन ही इस तरह किया गया है कि यूजर लंबे समय तक स्क्रीन से चिपका रहे। इसके परिणामस्वरूप बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटकने लगता है, उनकी नींद का चक्र बिगड़ जाता है और वे ‘ब्रेन रॉट’ यानी बिना सोचे-समझे लगातार कम गुणवत्ता वाला कंटेंट देखने की आदत का शिकार होने लगते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट का रुख: इंटरनेट पर पाबंदी नहीं, सुरक्षा जरूरी

बच्चों के इस डिजिटल इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) के तहत इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार बच्चों को भी है।

अदालत मुख्य रूप से बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री (CSAM) को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से हटाने और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के मामले पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक देशव्यापी डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया है, ताकि प्रतिबंधित सामग्री की पहचान और कानूनी कार्रवाई प्रभावी हो सके। साथ ही, कंपनियों को यह निर्देश भी दिए गए हैं कि आपत्तिजनक सामग्री हटाने के बाद दो घंटे के भीतर पुलिस या साइबर पोर्टल को सूचना दी जाए और ऐसी सामग्री से कमाई के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

स्क्रीन टाइम से बड़ा खतरा: ऑनलाइन ग्रूमिंग और सुरक्षा

खतरा सिर्फ इस बात का नहीं है कि बच्चा कितनी देर स्क्रीन के सामने बैठा है, बल्कि असली खतरा इस बात का है कि वह इंटरनेट पर क्या देख रहा है और उसके संपर्क में कौन आ रहा है।

कई बार बच्चे ऑनलाइन ग्रूमिंग का शिकार हो जाते हैं, जहां कोई अनजान व्यक्ति उनका भरोसा जीतकर निजी जानकारी या तस्वीरें मांगता है और बाद में उन्हें डराता-धमकाता है। दुनिया के कई देश इस पर कड़े कदम उठा रहे हैं। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के इस्तेमाल पर रोक से जुड़े कड़े नियम लागू किए गए हैं, ताकि वे ऑनलाइन खतरों से सुरक्षित रह सकें।

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समाधान: बच्चों से फोन छीनना नहीं, उन्हें जागरूक करना

इस समस्या से निपटने के लिए अचानक बच्चों से फोन छीनना या उन्हें डांटना सही उपाय नहीं है। इसके लिए कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है-

समय और सीमा तय करें: बच्चे को फोन देने से पहले उसकी उम्र के हिसाब से स्क्रीन टाइम और कंटेंट तय करें। पैरेंटल कंट्रोल और सुरक्षित सेटिंग्स का उपयोग करें।

डिजिटल सुरक्षा सिखाएं: बच्चों को समझाएं कि वे किसी भी अनजान व्यक्ति को अपनी निजी जानकारी, तस्वीरें या पासवर्ड न दें। किसी भी परेशानी की स्थिति में वे तुरंत माता-पिता को बताएं।

विकल्प और संवाद बढ़ाएं: हर बार रोने पर बच्चे को मोबाइल न दें। उनके साथ समय बिताएं और उन्हें आउटडोर गेम्स तथा अन्य रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें।

मोबाइल बच्चे के हाथ में देना गलत नहीं है, लेकिन बिना नियमों और निगरानी के उन्हें घंटों स्क्रीन के हवाले कर देना खतरनाक हो सकता है। इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखने के बजाय बच्चों को सुरक्षित और संतुलित तरीके से इसका उपयोग सिखाना ही आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।

Location :  New Delhi

Published :  26 October 2026, 4:02 PM IST