Pitru Paksha 2026: दुनिया का पहला श्राद्ध किसने और क्यों किया? जानें महर्षि निमि और महाभारत से जुड़ा पौराणिक रहस्य

Pitru Paksha 2026 Katha: 26 सितंबर से शुरू हो रहा है पितृ पक्ष। जानिए धरती पर सबसे पहला श्राद्ध किसने और क्यों किया था, और भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध का क्या रहस्य बताया था।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 25 September 2026, 9:58 AM IST

New Delhi: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) का विशेष धार्मिक महत्व होता है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष का आयोजन 26 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर तक होने जा रहा है। आश्विन मास की कृष्ण प्रतिपदा तिथि से शुरू होने वाले इस पक्ष में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्रद्धापूर्वक जल, अन्न, वस्त्र और पिंडदान अर्पित करते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन 16 दिनों के दौरान पितर स्वयं धरती पर निवास करते हैं और अपनी संतान से तृप्ति की उम्मीद रखते हैं। जो लोग अपने पितरों को तर्पण अर्पित करते हैं, उन्हें सुख-समृद्धि और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जबकि उपेक्षा करने पर पितृ दोष का सामना करना पड़ता है।

महर्षि निमि ने पुत्र शोक में शुरू की थी यह परंपरा

पौराणिक इतिहास के अनुसार, इस धरती पर सबसे पहला श्राद्ध महर्षि निमि ने किया था। जब उनके प्रिय पुत्र का असमय निधन हो गया, तो वे गहरे पुत्र शोक में डूब गए। अपने पुत्र की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए उन्होंने जल और अन्न से विधिपूर्वक अनुष्ठान किया।

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हालांकि, अनुष्ठान के बाद उनके मन में शंका हुई कि जिस कर्म को पहले किसी ऋषि-मुनि ने नहीं किया, उसे उन्होंने क्यों किया? शंका निवारण के लिए उन्होंने अपने पिता महर्षि अत्रि का स्मरण किया, जिन्होंने प्रकट होकर निमि को ढांढस बंधाया और बताया कि यह कर्म शास्त्रसम्मत है। इसके बाद महर्षि अत्रि से विधि सीखकर निमि ने पहला औपचारिक श्राद्ध संपन्न किया।

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बताया था श्राद्ध का गूढ़ रहस्य

महाभारत के अनुशासन पर्व में श्राद्ध परंपरा के प्राकट्य का विस्तृत उल्लेख मिलता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में बाणों की शैया पर लेटे भीष्म पितामह ने मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए धर्मराज युधिष्ठिर को श्राद्ध के महत्व और महर्षि निमि की कथा सुनाई थी। उन्होंने समझाया कि मनुष्य जन्म लेते ही तीन प्रकार के ऋणों देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से बंध जाता है।

श्राद्ध कर्म ही वह एकमात्र जरिया है जिससे मनुष्य पितृ ऋण से पूरी तरह मुक्त हो सकता है। भीष्म पितामह से ज्ञान मिलने के बाद युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध में मारे गए सभी योद्धाओं और मृत आत्माओं की शांति के लिए विशाल श्राद्ध कर्म करवाया था।

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त्रेता युग में भगवान राम और माता सीता ने किया था राजा दशरथ का पिंडदान

श्राद्ध की यह पावन परंपरा केवल द्वापर या कलयुग तक सीमित नहीं है, बल्कि त्रेता युग में भी इसका पालन किया गया था। अपने पिता राजा दशरथ के देवलोकगमन के बाद भगवान श्रीराम ने मर्यादापूर्वक उनका श्राद्ध किया था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, गया धाम में माता सीता ने राजा दशरथ की तृप्ति के लिए बालू (फल्गु नदी की रेत) का पिंड बनाकर दान किया था, जिसे राजा दशरथ की आत्मा ने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि पितरों का तर्पण अनादि काल से सनातन संस्कृति का अटूट हिस्सा रहा है।

Location :  New Delhi

Published :  25 September 2026, 9:58 AM IST