Eid al Adha 2026: चांद नजर आते ही तय होगी बकरीद की तारीख और इबादत

ईद-उल-अजहा 2026 की तारीख जिलहिज्जा के चांद पर तय होगी। 17 मई को चांद दिखने पर 27 मई को बकरीद मनाई जाएगी, अन्यथा 28 मई को। इस मौके पर तीन दिन तक कुर्बानी की जाएगी।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 17 May 2026, 11:45 AM IST

New Delhi: ईद-उल-अजहा (बकरीद) 2026 की तारीख इस्लामी महीने जिलहिज्जा के चांद दिखने पर निर्भर करेगी। जानकारी के अनुसार रविवार, 17 मई की शाम चांद देखने की कोशिश की जाएगी। यदि चांद नजर आ जाता है तो ईद-उल-अजहा बुधवार, 27 मई को मनाई जाएगी। वहीं यदि चांद दिखाई नहीं देता है तो यह पर्व गुरुवार, 28 मई को मनाया जाएगा। इसी के साथ माहे जिलहिज्जा की शुरुआत मानी जाएगी।

कुर्बानी का महत्व और इस्लामी शिक्षाएं

शहर काजी मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि इस्लाम धर्म में कुर्बानी को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों के लिए यह एक अहम इबादत है, जो अल्लाह की रज़ा के लिए की जाती है। बकरीद का पर्व हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है।

मुफ्ती-ए-शहर अख्तर हुसैन मन्नानी के अनुसार कुरआन में अल्लाह का हुक्म है कि अपने रब के लिए नमाज पढ़ो और कुर्बानी करो। उन्होंने बताया कि यह पर्व त्याग, समर्पण और आस्था का प्रतीक है। कुर्बानी के दौरान यह नीयत भी रखी जाती है कि इंसान अपने अंदर की बुराइयों और गलत आदतों को भी छोड़ दे।

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तीन दिन तक चलेगी कुर्बानी

जानकारी के अनुसार ईद-उल-अजहा के अवसर पर मुसलमानों द्वारा लगातार तीन दिनों तक कुर्बानी की जाती है। यह प्रक्रिया धार्मिक परंपराओं के अनुसार की जाती है और इसे इस्लाम में विशेष महत्व दिया गया है। यह पर्व समाज में त्याग और भाईचारे का संदेश देता है।

दर्स-ए-कुरआन में सूरह फातिहा की व्याख्या

न्यू कॉलोनी तुर्कमानपुर और जाफरा बाजार स्थित सब्जपोश हाउस मस्जिद में साप्ताहिक दर्स-ए-कुरआन का आयोजन किया गया। इसमें हाफिज रहमत अली निजामी ने सूरह फातिहा की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि यह कुरआन की सबसे महत्वपूर्ण सूरहों में से एक है, जिसमें कुल सात आयतें हैं।

उन्होंने कहा कि सूरह फातिहा अल्लाह की प्रशंसा, उसकी दया और सीधे मार्ग पर चलने की दुआ का संदेश देती है। इसे हर नमाज़ की हर रकात में पढ़ा जाता है और यह इंसान को सही राह पर चलने की प्रेरणा देती है।

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धार्मिक शिक्षा और दुआ का महत्व

कार्यक्रम में कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने बताया कि सूरह फातिहा अल्लाह और बंदे के बीच सीधा संबंध स्थापित करती है। यह मानसिक शांति देने के साथ-साथ इंसान को बुरी सोच और नकारात्मकता से दूर रखती है। अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर देश और समाज की भलाई के लिए दुआ की गई।

Location :  New Delhi

Published :  17 May 2026, 11:45 AM IST