रिश्वत मांगने वाले सरकारी कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट का बड़ा झटका! क्या अब बिना मंजूरी भी चलेगा भ्रष्टाचार का मुकदमा?

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A को लेकर अहम फैसला सुनाया है, जिससे रिश्वत मांगने के आरोपों में घिरे सरकारी कर्मचारियों की कानूनी सुरक्षा पर नई चर्चा शुरू हो गई है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 18 October 2026, 2:22 PM IST

New Delhi: सरकारी पद पर बैठकर रिश्वत मांगने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला सामने आया है। अदालत ने साफ किया है कि रिश्वत मांगने जैसे कथित आपराधिक कृत्य के मामले में सरकारी कर्मचारी को जांच से पहले मिलने वाली मंजूरी की सुरक्षा का लाभ अपने आप नहीं मिल सकता।

रिश्वत के आरोप में कांस्टेबल की याचिका खारिज

यह मामला राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल से जुड़ा है, जिस पर 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था। कांस्टेबल ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर और दाखिल चार्जशीट को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। हालांकि, अदालत ने उसकी अपील खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि संबंधित कानूनी प्रावधान का लाभ हर सरकारी कर्मचारी को बिना मामले की परिस्थितियां देखे नहीं दिया जा सकता।

क्या है भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A की व्याख्या की। इस पीठ में जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल थे। धारा 17A को साल 2018 में कानून में जोड़ा गया था।

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इस प्रावधान के तहत सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिश या लिए गए फैसले से जुड़े कथित अपराध की जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी जरूरी हो सकती है। इसका उद्देश्य अधिकारियों को उनके आधिकारिक कामकाज के दौरान लिए गए फैसलों के कारण बेवजह आपराधिक कार्रवाई का सामना करने से बचाना है।

रिश्वत मांगना आधिकारिक काम का हिस्सा नहीं

सुनवाई के दौरान राजस्थान की अतिरिक्त महाधिवक्ता संस्कृति पाठक की दलीलों को स्वीकार करते हुए पीठ ने कहा कि रिश्वत मांगना अपने आप में आपराधिक कृत्य है। इसका किसी सरकारी कर्मचारी की आधिकारिक सिफारिश या निर्णय से जरूरी तौर पर कोई संबंध नहीं होता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 17A का संरक्षण सभी लोक सेवकों पर एक जैसा और बिना भेदभाव लागू नहीं किया जा सकता। किसी मामले में यह देखना जरूरी है कि आरोपित कृत्य का संबंध आधिकारिक कामकाज से है या वह स्वतंत्र रूप से किया गया कथित अपराध है।

मंजूरी नहीं होने से पूरी कार्रवाई रद्द नहीं होगी

फैसला लिखते हुए जस्टिस एनवी अंजारिया ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर कांस्टेबल का कथित कृत्य धारा 17A के तहत मिलने वाले संरक्षण के दायरे में नहीं आता। इसलिए केवल मंजूरी न होने के आधार पर पूरी कानूनी कार्रवाई को दूषित नहीं माना जा सकता।

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सरकारी कर्मचारियों के लिए क्या है फैसले का मतलब?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मुख्य संदेश यह है कि आधिकारिक फैसलों से जुड़े मामलों में मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को रिश्वत मांगने के आरोपों में स्वतः लागू नहीं माना जा सकता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर सरकारी कर्मचारी के खिलाफ हर मामले में मंजूरी की जरूरत खत्म हो गई है। अदालत ने मामले की प्रकृति और आरोपों के आधार पर कानूनी प्रावधान लागू करने की अहमियत स्पष्ट की है।

Location :  New Delhi

Published :  18 October 2026, 2:21 PM IST