क्या बच्चों की ऐसी परवरिश के लिए माता-पिता जिम्मेदार? कंगना रनौत की राय पर छिड़ी बहस

सीजेपी छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित अभद्र भाषा और जेन ज़ी पर कंगना रनौत की टिप्पणी को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कंगना ने माता-पिता की परवरिश पर सवाल उठाए, जबकि उनकी इंस्टाग्राम पोस्ट की भाषा की भी आलोचना हो रही है। पूरा विवाद अभिव्यक्ति और भाषा की मर्यादा पर केंद्रित है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 29 July 2026, 1:35 PM IST

New Delhi: हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी (CJP) से जुड़े छात्र प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गई कथित अभद्र भाषा को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। इस विवाद के बीच अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत की टिप्पणी भी चर्चा का विषय बन गई है। छात्रों के विरोध प्रदर्शन और नई पीढ़ी यानी जेन ज़ी (Gen Z) को लेकर दिए गए उनके बयान ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है।

छात्र प्रदर्शन की भाषा पर उठे सवाल

जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित रूप से आपत्तिजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किए जाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन विरोध के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और अभिव्यक्ति भी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए। वहीं, प्रदर्शन से जुड़े लोगों का पक्ष है कि युवाओं का गुस्सा व्यवस्था के प्रति असंतोष का परिणाम है।

कंगना रनौत ने क्या कहा?

जब कंगना रनौत से छात्र प्रदर्शन को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि आज की जेन ज़ी पीढ़ी को सही संस्कार नहीं मिल रहे हैं और इसमें माता-पिता की भी जिम्मेदारी है। उनका कहना था कि कई बच्चे अपने माता-पिता की उदार परवरिश का गलत फायदा उठाते हैं और सार्वजनिक जीवन में मर्यादित व्यवहार नहीं करते। उनके इस बयान पर सोशल मीडिया पर पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

इंस्टाग्राम पोस्ट पर भी मचा विवाद

इसी बीच कंगना रनौत की एक इंस्टाग्राम पोस्ट भी विवादों में आ गई। पोस्ट में उन्होंने कथित तौर पर जेन ज़ी को लेकर तीखी और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस भाषा की आलोचना करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए।

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'कॉकरोच' और 'वायरस' जैसी भाषा पर क्यों होती है बहस?

राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में किसी समूह के लिए "कॉकरोच", "वायरस", "कीड़े-मकोड़े" जैसे शब्दों का इस्तेमाल लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। इतिहास बताता है कि किसी समुदाय या समूह को अमानवीय बताने वाली भाषा गंभीर सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है। इसलिए विशेषज्ञ बार-बार सार्वजनिक संवाद में संयमित और जिम्मेदार भाषा के इस्तेमाल की आवश्यकता पर जोर देते हैं।

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विरोध की आजादी बनाम भाषा की मर्यादा

पूरा विवाद एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है क्या लोकतांत्रिक विरोध के दौरान किसी भी तरह की भाषा का इस्तेमाल उचित है? एक पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानता है, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि असहमति व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन अपमानजनक भाषा लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती है। इसी तरह, सार्वजनिक हस्तियों के बयान भी समाज में व्यापक प्रभाव छोड़ते हैं, इसलिए उनसे संतुलित भाषा की अपेक्षा की जाती है।

Location :  New Delhi

Published :  29 July 2026, 1:35 PM IST