
Gen Z
नई दिल्ली: कभी मीम्स, रील्स और ऑनलाइन बहसों के जरिए अपनी बात रखने वाली Gen Z अब दिल्ली की सड़कों पर भी दिखाई दे रही है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस्तीफे की मांग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर विवाद और ‘लेहरा दो तिरंगा’ मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई ने इस युवा आंदोलन को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा इस आंदोलन के चर्चित चेहरों में शामिल हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर युवाओं में इतना आक्रोश क्यों दिखाई दे रहा है? क्या यह सिर्फ चुनाव आयोग के खिलाफ नाराजगी है या इसके पीछे रोजगार, परीक्षा विवाद, राजनीतिक व्यवस्था पर भरोसे और अपनी आवाज सुने जाने की व्यापक चिंता भी है?
वोटर लिस्ट का विवाद बना गुस्से का तात्कालिक कारण
मौजूदा आंदोलन का केंद्र SIR प्रक्रिया है। प्रदर्शनकारी आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने से लोगों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। वे मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है और भाजपा ने विपक्ष पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है। इसलिए नाम हटने के आंकड़ों और उनके कारणों को लेकर राजनीतिक आरोपों तथा आधिकारिक तथ्यों में अंतर करना जरूरी है।
जानकारी के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाया है। हालांकि, हटाए गए नामों में मृत, स्थानांतरित या सत्यापित नहीं हो सके मतदाताओं के नाम शामिल होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में पूरी संख्या को गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं की संख्या मानना उचित नहीं होगा।
युवाओं के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सूची में कितने नाम हैं, बल्कि यह भी है कि मतदाता सूची से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी।
नौकरी, परीक्षा विवाद और व्यवस्था से नाराजगी का कनेक्शन
Gen Z के इस आंदोलन को केवल एक राजनीतिक मुद्दे के चश्मे से देखना इसकी पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। इससे पहले परीक्षा पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी युवा संगठित होकर आवाज उठा चुके हैं। ऐसे अनुभवों से पैदा हुई नाराजगी चुनावी पारदर्शिता जैसे सवालों के साथ जुड़ सकती है।
हालांकि, यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि सभी प्रदर्शनकारी एक ही वजह से सड़कों पर उतरे हैं। किसी के लिए वोट का अधिकार प्रमुख मुद्दा हो सकता है, तो किसी के लिए संस्थागत जवाबदेही या राजनीतिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी। युवाओं के बीच असहमति के अलग-अलग कारण हो सकते हैं, लेकिन अपनी बात सुने जाने की अपेक्षा उन्हें एक साझा मंच दे सकती है।
सोशल मीडिया से सड़क तक कैसे पहुंचा आंदोलन?
CJP जैसे नए युवा मंच मीम्स, व्यंग्य और डिजिटल प्रचार के जरिए लोगों तक पहुंच बनाते हैं। इसके उलट AISA की पृष्ठभूमि संगठित छात्र राजनीति से जुड़ी है। अलग-अलग कार्यशैली वाले इन समूहों का एक मुद्दे पर साथ आना आंदोलन को व्यापक दृश्यता देता है।
16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस में प्रस्तावित तिरंगा मार्च से पहले अभिजीत दिपके और नेहा बोरा को हिरासत में लिया गया। पुलिस कार्रवाई और नेताओं की रिहाई को लेकर उठे सवालों ने आंदोलन को और सुर्खियों में ला दिया। इसके बाद विरोध केवल SIR तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन की बहस भी सामने आई।
क्या Gen Z का गुस्सा स्थायी राजनीतिक ताकत बनेगा?
युवाओं का सड़कों पर उतरना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वे किसी एक राजनीतिक दल के समर्थन में एकजुट हैं। इसी तरह, किसी आंदोलन में बड़ी भीड़ दिखाई देना और उसे लंबे समय तक संगठित राजनीतिक ताकत में बदल पाना दो अलग चुनौतियां हैं।
आंदोलन का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इसकी मांगों को स्पष्ट और सत्यापित तथ्यों के साथ आगे बढ़ाया जाता है, क्या अलग-अलग समूह साझा मुद्दों पर टिके रहते हैं और क्या विरोध के साथ कोई दीर्घकालिक संगठनात्मक ढांचा भी बनता है।
फिलहाल Gen Z के आक्रोश को केवल पीढ़ीगत विद्रोह कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह चुनावी प्रक्रिया पर उठते सवालों, राजनीतिक जवाबदेही की मांग और युवाओं की भागीदारी की इच्छा का मेल हो सकता है। असली परीक्षा यह है कि सड़कों पर उठी आवाज संस्थागत जवाबों और ठोस बदलाव तक पहुंचती है या नहीं।
Location : New Delhi
Published : 19 October 2026, 3:36 PM IST