
कर्नाटक हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी (IMG: Pinterest)
Karnataka: वैवाहिक विवादों में पति-पत्नी के बीच कानूनी लड़ाई शुरू होना अक्सर रिश्ते में बढ़ते तनाव का संकेत माना जाता है, लेकिन क्या सिर्फ कोर्ट में केस दाखिल कर देना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है? कर्नाटक हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि सिर्फ कानूनी कार्यवाही शुरू करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं है, अगर उस कानूनी कदम के पीछे उचित और न्यायोचित आधार मौजूद हों। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी पक्ष द्वारा अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करने को केवल इस आधार पर गलत नहीं ठहराया जा सकता कि इससे वैवाहिक रिश्ते में तनाव बढ़ गया।
जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस एच. शांति भूषण की डिवीजन बेंच ने तुमकुरु की फैमिली कोर्ट के अप्रैल 2019 के आदेश को रद्द कर दिया। फैमिली कोर्ट ने पत्नी की ओर से दायर दांपत्य अधिकारों की बहाली यानी Restitution of Conjugal Rights की याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के उस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया, जिसमें पत्नी की ओर से शुरू की गई विभिन्न कानूनी कार्यवाहियों को पति-पत्नी के बीच बढ़े विवाद से जोड़ते हुए पति के अलग रहने को उचित माना गया था।
मामले में पत्नी की ओर से भरण-पोषण की मांग, आपराधिक कार्यवाही और संपत्ति से जुड़ी कानूनी कार्रवाई की गई थी। फैमिली कोर्ट ने इन कार्यवाहियों के कारण पति-पत्नी के बीच पैदा हुई कटुता को ध्यान में रखा था। हाई कोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि यदि कोई जीवनसाथी अपने वैध अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है और उसके पास ऐसा करने का उचित आधार है, तो केवल मुकदमा दायर करने की वजह से उस कार्रवाई को मानसिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता।
हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए यह भी कहा कि यदि एक जीवनसाथी के आचरण के कारण दूसरे पक्ष को अपने संरक्षण या अधिकारों के लिए कानूनी रास्ता अपनाना पड़ा हो, तो बाद में उसी कानूनी कार्रवाई को अलग रहने का आधार नहीं बनाया जा सकता। यानी अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी मुकदमे का अस्तित्व अकेले यह तय नहीं करता कि उसे दाखिल करने वाला पक्ष मानसिक क्रूरता कर रहा था।
हाई कोर्ट ने पत्नी की याचिका को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत के फैसले का नतीजा यह रहा कि पत्नी की ओर से पति के साथ वैवाहिक जीवन बहाल करने और साथ रहने की मांग को राहत मिली। इस मामले में हाई कोर्ट का फैसला यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने रखता है कि पति या पत्नी द्वारा अदालत में जाना और अपने अधिकारों के लिए कानूनी उपाय अपनाना, परिस्थितियों की जांच किए बिना मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।
Location : Karnataka
Published : 5 October 2026, 1:54 PM IST
Topics : Karnataka High Court Marriage Law Matrimonial Dispute Mental Cruelty Restitution Of Conjugal Rights