
सामाजिक मुद्दों पर भी बनाई कई यादगार फिल्में( AI Generated ig)
New Delhi: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे कलाकार और फिल्मकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी फिल्मों से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। V. Shantaram भी उन्हीं महान फिल्मकारों में से एक थे। 30 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर पूरा सिनेमा जगत उनके योगदान को याद कर रहा है। उन्होंने अपनी फिल्मों के माध्यम से न सिर्फ लोगों का मनोरंजन किया, बल्कि समाज की बुराइयों को भी पर्दे पर दिखाकर लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया।
V. Shantaram का पूरा नाम शांताराम राजाराम वणकुद्रे था। उनका जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। उन्हें प्यार से अन्नासाहेब भी कहा जाता था। बचपन से ही उन्हें कला और फिल्मों में रुचि थी। उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत छोटे-मोटे कामों से की थी। धीरे-धीरे उन्होंने अभिनय और फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं और आगे चलकर भारतीय सिनेमा के बड़े नाम बन गए।
V. Shantaram की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह फिल्मों को केवल मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे। उनकी फिल्मों में समाज की सच्चाई, महिलाओं की स्थिति, गरीबी, जातिगत भेदभाव और इंसानियत जैसे मुद्दे देखने को मिलते थे। उनकी चर्चित फिल्मों में 'दो आंखें बारह हाथ', 'Dr. Kotnis की अमर कहानी', 'झनक झनक पायल बाजे', 'नवरंग', 'दुनिया न माने' और 'पिंजरा' शामिल हैं। फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' में उन्होंने जेल के कैदियों को सुधारने और उन्हें अच्छा इंसान बनाने की कहानी दिखाई थी। वहीं 'दुनिया न माने' के जरिए उन्होंने कम उम्र में लड़कियों की शादी जैसी सामाजिक बुराई पर सवाल उठाए थे।
V. Shantaram ने 1929 में प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद 1942 में उन्होंने मुंबई में राजकमल कलामंदिर स्टूडियो की स्थापना की। इस स्टूडियो के जरिये उन्होंने कई बेहतरीन फिल्मों का निर्माण किया। वह नई तकनीकों को अपनाने और फिल्मों में नए प्रयोग करने के लिए भी जाने जाते थे। मूक फिल्मों से लेकर रंगीन फिल्मों तक उन्होंने भारतीय सिनेमा में कई बदलाव देखे और खुद भी नए प्रयोग किए।
फिल्म निर्माण में भी छोड़ी खास पहचान( AI Generated ig )
भारतीय सिनेमा में उनके शानदार योगदान के लिए उन्हें साल 1985 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें कई National और International सम्मान भी मिले। साल 1992 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 30 अक्टूबर 1990 को मुंबई में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी बनाई फिल्में आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। V. Shantaram ने अपने काम से साबित किया कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाने का एक मजबूत जरिया भी हो सकता है। यही वजह है कि भारतीय सिनेमा में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा।
Location : New Delhi
Published : 30 October 2026, 11:13 AM IST