बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों को करारी हार का सामना करना पड़ा। इस खबर में जानिए ठाकरे ब्रदर्स की हार की वजहें और मुंबई की बदलती राजनीतिक तस्वीर।

राज और उद्धव (Img:Google)
Mumbai: बीएमसी चुनाव के नतीजों ने मुंबई की राजनीति में एक बार फिर बड़ा संदेश दे दिया है। लंबे समय से चर्चा में रहे ठाकरे ब्रदर्स इस बार भी जनता का भरोसा जीतने में नाकाम रहे। राज ठाकरे की मनसे एक बार फिर चुनावी मैदान में फ्लॉप साबित हुई। वहीं उद्धव ठाकरे की पार्टी का भी खाता नहीं खुल पाया। ऐसे में अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर बीएमसी जैसे अहम चुनाव में ठाकरे ब्रदर्स से कहां चूक हो गई।
बीएमसी चुनाव को मुंबई की सत्ता का सेमीफाइनल कहा जाता है। यहां जीत हासिल करना किसी भी पार्टी के लिए बड़ी राजनीतिक ताकत मानी जाती है। इस बार चुनाव में कई नए समीकरण बने, लेकिन ठाकरे ब्रदर्स उन समीकरणों में फिट नहीं बैठ पाए। दोनों पार्टियों की मौजूदगी के बावजूद वोटर उनसे जुड़ता नजर नहीं आया।
राज ठाकरे ने चुनाव से पहले कई मुद्दों को उठाया, सभाएं कीं और अपनी पुरानी आक्रामक शैली में वोटरों को साधने की कोशिश की। लेकिन जमीनी स्तर पर संगठन की कमजोरी साफ नजर आई। मनसे का कैडर न तो पूरी तरह एक्टिव दिखा और न ही पार्टी कोई ऐसा मुद्दा सामने रख पाई, जो सीधे आम मुंबईकर को प्रभावित करे।
उद्धव ठाकरे के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा से जुड़ा था। पार्टी टूटने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि सहानुभूति का फायदा मिलेगा लेकिन नतीजे इसके उलट रहे। कार्यकर्ताओं में बिखराव, नेतृत्व को लेकर असमंजस और स्पष्ट राजनीतिक दिशा की कमी पार्टी पर भारी पड़ी। वोटर यह तय नहीं कर पाया कि उद्धव ठाकरे किस तरह की राजनीति आगे बढ़ाना चाहते हैं।
मुंबई का वोटर अब भावनाओं से ज्यादा कामकाज और स्थिर नेतृत्व को महत्व दे रहा है। इस चुनाव में विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक क्षमता जैसे मुद्दे हावी रहे। ठाकरे ब्रदर्स इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में पीछे रह गए, जिसका सीधा असर नतीजों में दिखा।
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आगे की राह
बीएमसी चुनाव ने साफ कर दिया है कि केवल नाम और विरासत के सहारे चुनाव नहीं जीते जा सकते। अगर ठाकरे ब्रदर्स को आगे अपनी राजनीति बचानी है। उन्हें संगठन मजबूत करने, नई रणनीति बनाने और जमीनी मुद्दों पर फोकस करना होगा।