
सुप्रीम कोर्ट
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के मालिकाना हक और उत्तराधिकारियों के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि केवल बिक्री समझौते (Agreement to Sell) के आधार पर अचल संपत्ति का मालिकाना हक हासिल नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि जब किसी संपत्ति पर मालिकाना हक को लेकर गंभीर विवाद हो और उसके पक्ष में रजिस्टर्ड सेल डीड मौजूद हो, तो केवल कब्जा पाने की मांग करना पर्याप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में मालिकाना हक की घोषणा या संबंधित दस्तावेज को रद्द कराने जैसी उचित राहत मांगना जरूरी हो सकता है।
यह मामला नई दिल्ली की फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित करीब 4,132 वर्ग गज के प्लॉट से जुड़ा है। एक कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी ने सोहन सिंह के साथ प्लॉट बेचने का समझौता किया था। इसकी शर्त थी कि उन्हें तीन साल के भीतर प्लॉट पर मकान बनाना होगा, अन्यथा खरीद का अधिकार समाप्त हो सकता था।
निर्धारित अवधि समाप्त होने से पहले सोहन सिंह ने सोसाइटी को पत्र लिखकर प्लॉट अपने भतीजे बताए गए गुरबख्श सिंह के नाम हस्तांतरित करने का अनुरोध किया। सोसाइटी ने अनुरोध स्वीकार कर लिया। इसके बाद गुरबख्श सिंह ने प्लॉट पर कब्जा लिया, अपने खर्च पर मकान बनवाया और वर्ष 1960 में उनके नाम रजिस्टर्ड सेल डीड भी निष्पादित हुई।
बाद में सोहन सिंह के उत्तराधिकारियों ने संपत्ति का कब्जा पाने के लिए मुकदमा दायर किया। हालांकि, उन्होंने गुरबख्श सिंह के नाम दर्ज सेल डीड को रद्द कराने या अनुबंध के विशिष्ट पालन (Specific Performance) की मांग नहीं की।
ट्रायल कोर्ट ने मुकदमे को एस्टोपेल के सिद्धांत के आधार पर खारिज कर दिया। इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने भी फैसला बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने परिसीमा कानून के तहत मुकदमे को समय-सीमा से बाधित माना और आंशिक पालन के आधार पर किए गए दावे को स्वीकार नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि जब वादी के मालिकाना हक पर गंभीर और ठोस विवाद हो, तो केवल कब्जा प्राप्त करने की मांग वाला मुकदमा पर्याप्त नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में संपत्ति के अधिकार की घोषणा जैसी उचित राहत मांगनी आवश्यक है।
पीठ ने अनातुला सुधाकर बनाम पी. बुची रेड्डी मामले में निर्धारित कानूनी सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, जब प्रतिवादी के पक्ष में रजिस्टर्ड सेल डीड मौजूद हो और उससे वादी के दावे पर संदेह पैदा होता हो, तो मुकदमे में उस दस्तावेज और मालिकाना हक से संबंधित उचित राहत की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है।
अदालत ने दोहराया कि केवल एग्रीमेंट टू सेल अपने आप में अचल संपत्ति में मालिकाना हक या हित पैदा नहीं करता। सामान्यतः संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित करने के लिए कानून के अनुरूप पंजीकृत हस्तांतरण दस्तावेज आवश्यक होता है।
इस मामले में सोहन सिंह का पत्र भी अहम साबित हुआ। उन्होंने स्वयं प्लॉट को किसी दूसरे व्यक्ति के नाम हस्तांतरित करने का अनुरोध किया था। अदालत ने माना कि उनके पूर्व आचरण और लिखित सहमति के बाद उनके उत्तराधिकारी उससे असंगत दावा नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 115 में निहित एस्टोपेल के सिद्धांत का उल्लेख किया। इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपने बयान या आचरण से दूसरे व्यक्ति को किसी तथ्य पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है और दूसरा व्यक्ति उस विश्वास के आधार पर कदम उठाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार पहले व्यक्ति को बाद में उससे विपरीत रुख अपनाने से रोका जा सकता है।
अदालत ने यह भी माना कि इस मामले में ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 53A के तहत आंशिक पालन का संरक्षण उपलब्ध नहीं था, क्योंकि संबंधित पक्ष आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी नहीं करते थे। धोखाधड़ी के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त ठोस साक्ष्य भी नहीं मिले।
परिसीमा अधिनियम, 1963 की संबंधित धाराओं और मुकदमे की पोषणीयता पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और अपील खारिज कर दी। अदालत ने लंबित आवेदनों का निपटारा करते हुए खर्चों के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।
यह फैसला संपत्ति विवादों में बिक्री समझौते, रजिस्टर्ड सेल डीड, मालिकाना हक की घोषणा और उत्तराधिकारियों पर पूर्व सहमति के प्रभाव से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित करता है।
Location : New Delhi
Published : 22 October 2026, 9:20 AM IST
Topics : Agreement to Sell Property Property Dispute India Property Ownership Rights Registered Sale Deed Supreme Court Property Judgment