वंदे मातरम् के 150 वर्ष, राष्ट्रगीत से जुड़ी रोचक बातें; जो हर भारतीय को जाननी चाहिए

राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर देशभर में विविध सांस्कृतिक, साहित्यिक और संगीतात्मक कार्यक्रमों की धूम मची हुई है। इसी कड़ी में बिहार के सहरसा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल सामने आई है।

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 26 January 2026, 1:44 PM IST

New Delhi: भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देशभर में राष्ट्रभक्ति से जुड़े कार्यक्रमों की श्रृंखला चल रही है। सरकारी मंचों से लेकर सांस्कृतिक संस्थानों और कलाकारों तक, हर स्तर पर इस ऐतिहासिक गीत को नए स्वरूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसी क्रम में बिहार के सहरसा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल सामने आई है, जिसने वंदे मातरम् 150 अभियान को नई दिशा और ऊर्जा दी है।

पहली बार जनसामान्य तक पहुंचा मैथिली संस्करण

वंदे मातरम् का मैथिली संस्करण पहली बार आम लोगों के बीच प्रस्तुत किया गया है। मूल रूप से बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा बांग्ला भाषा में रचित इस राष्ट्रगीत का मैथिली अनुवाद सहरसा निवासी वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अरविन्द कुमार मिश्र ‘नीरज’ ने किया है। यह अनुवाद मैथिली भाषा और संस्कृति के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का प्रयास और मजबूत हुआ है।

20 वर्ष पुराना अनुवाद, अब मिला राष्ट्रीय मंच

प्रो. अरविन्द मिश्र नीरज ने बताया कि उन्होंने वंदे मातरम् का यह मैथिली अनुवाद लगभग 20 वर्ष पूर्व किया था। उस समय यह रचना सीमित दायरे में ही रही, लेकिन वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे जनसामान्य तक पहुंचाने का सौभाग्य मिला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत का मातृभाषा में गायन लोगों को भावनात्मक रूप से और गहराई से जोड़ता है।

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संगीत और साधना का अद्भुत संगम

इस मैथिली संस्करण को स्वर दिया है दिल्ली की प्रसिद्ध गायिका डॉ. सुष्मिता झा ने। खास बात यह है कि उन्होंने न केवल गीत को गाया, बल्कि इसकी धुन भी स्वयं तैयार की। गीत को भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग बागेश्वरी में प्रस्तुत किया गया है, जो इसकी भावनात्मक गहराई को और प्रभावशाली बनाता है। यह गीत अब डॉ. सुष्मिता झा के यूट्यूब चैनल पर वीडियो फॉर्मेट में उपलब्ध है, जहां इसे व्यापक सराहना मिल रही है।

दिल्ली में प्रस्तुति, 500 लोगों ने खड़े होकर गाया गीत

गत माह डॉ. सुष्मिता झा ने इस मैथिली संस्करण को दिल्ली के मावलंकर सभागार में प्रस्तुत किया था। इस कार्यक्रम के दौरान लगभग 500 दर्शकों ने खड़े होकर वंदे मातरम् का गायन किया, जो इस संस्करण की लोकप्रियता और प्रभाव को दर्शाता है। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इसे भाषा, संगीत और राष्ट्रभक्ति का अनुपम संगम बताया।

साहित्यिक योगदान और सम्मान

प्रो. अरविन्द मिश्र नीरज केवल वंदे मातरम् के अनुवाद तक सीमित नहीं हैं। वे श्रीमद्भागवत गीता का मैथिली अनुवाद भी कर चुके हैं, जो वर्तमान में प्रकाशनाधीन है। उनकी इस उपलब्धि पर साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक जगत से जुड़े कई गणमान्य लोगों ने उन्हें बधाइयां दी हैं।

वंदे मातरम् 150 अभियान को मिली नई मजबूती

वंदे मातरम् 150 अभियान का उद्देश्य देशवासियों में देशभक्ति की भावना को और प्रबल करना तथा स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों को याद दिलाना है। मैथिली संस्करण के सामने आने से यह अभियान और भी व्यापक हुआ है। यह पहल यह साबित करती है कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है, जो हर भाषा, हर क्षेत्र और हर पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम से जोड़ने की शक्ति रखता है।

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क्या है वंदे मातरम् का मतलब?

वंदे मातरम् का शाब्दिक अर्थ है - मैं मां को नमन करता हूं या भारत माता, मैं आपकी स्तुति करता हूं। इसी वजह से इसे भारत माता का गीत भी कहा जाता है। ‘वंदे’ संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ नमन करना या प्रणाम करना होता है, जबकि ‘मातरम्’ इंडो-यूरोपीय मूल का शब्द है, जिसका अर्थ मां होता है। यह गीत मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, सम्मान और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है।

150 साल बाद भी उतना ही प्रासंगिक

आज देशभक्ति के इस प्रतीक गीत को 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं और पूरे देश में इसे लेकर उत्सव का माहौल है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का एक प्रभावशाली हथियार बन गया था। वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों ने देशवासियों में साहस और आत्मबल का संचार किया।

किसने लिखा था वंदे मातरम्?

वंदे मातरम् गीत की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में की थी। बाद में विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे स्वरबद्ध कर गीत के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे इसकी लोकप्रियता और व्यापक हो गई।

कांग्रेस अधिवेशन से जनआंदोलन तक

वर्ष 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् को पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। इसके बाद यह गीत देखते ही देखते स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया। देशभर में आंदोलनों, सभाओं और जुलूसों में यह गीत गूंजने लगा और आम जनता की जुबान पर चढ़ गया।

अंग्रेजों को क्यों लगा खतरा?

वंदे मातरम् की धुन सुनते ही लोगों में देशभक्ति और विद्रोह की भावना जाग उठती थी। यही कारण था कि ब्रिटिश हुकूमत ने इसे अपने शासन के लिए खतरा मानते हुए इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बावजूद स्वतंत्रता सेनानी इसे गुप्त रूप से गाते रहे और इसे संघर्ष का हथियार बनाए रखा।

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राष्ट्रीय गीत का दर्जा

देश की आजादी के बाद वंदे मातरम् के ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए 24 जनवरी 1950 को इसे आधिकारिक रूप से भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया। आज भी यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम, बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अमर पहचान बना हुआ है।

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  • New Delhi

Published : 
  • 26 January 2026, 1:44 PM IST