होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के चलते वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है, लेकिन भारत ने पहले ही बड़ा कदम उठा लिया है। भारत ने रूस से करीब 6 करोड़ बैरल कच्चा तेल खरीदकर संभावित संकट को टाल दिया है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ गया है।

तेल वाला जहाज (Img: Google)
New Delhi: ईरान-अमेरिका तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। जिसका असर भारत पर भी देखने को मिल रहा है। भारतीय तेल टैंकर भी इस रूट पर फंसे हुए हैं। हालांकि, इस संभावित संकट से निपटने के लिए भारत ने पहले ही बड़ी तैयारी कर ली है। भारत ने इतनी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया है कि आने वाले समय में तेल संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने अगले महीने की डिलीवरी के लिए रूस से करीब 6 करोड़ बैरल कच्चा तेल खरीदा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ गया है, जिसके चलते यह फैसला लिया गया। यह खरीद खासतौर पर इसलिए अहम है क्योंकि होर्मुज से शिपिंग में अब भी रुकावट बनी हुई है।
बताया गया है कि यह रूसी तेल ब्रेंट क्रूड के मुकाबले 5 से 15 डॉलर प्रति बैरल प्रीमियम पर खरीदा गया है। इससे साफ है कि बाजार में सप्लाई कम है और मांग ज्यादा है। यह मात्रा भारत की मौजूदा मासिक खरीद के बराबर है और फरवरी के मुकाबले लगभग दोगुनी है। जिससे साफ संकेत मिलता है कि फिलहाल देश में तेल की कमी नहीं होगी।
भारत ने यह खरीद ऐसे समय पर की जब अमेरिका ने रूसी तेल पर कुछ शर्तों के साथ छूट दी। 5 मार्च से पहले लोड हुए तेल की डिलीवरी की अनुमति दी गई थी। जिसे बाद में 12 मार्च तक बढ़ा दिया गया। इस छूट ने भारत को होर्मुज संकट के बीच वैकल्पिक सप्लाई सुनिश्चित करने में मदद की।
मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) और हिंदुस्तान मित्तल एनर्जी लिमिटेड जैसी कंपनियों ने दिसंबर के बाद रूसी तेल की खरीद कम कर दी थी लेकिन अब हालात बदलने के बाद इन कंपनियों ने फिर से रूस की ओर रुख कर लिया है।
हाल के महीनों में भारत सऊदी अरब और इराक से तेल खरीद रहा था लेकिन क्षेत्रीय संघर्ष के कारण इन देशों से आने वाली कई खेपें फारस की खाड़ी में फंस गईं। इससे सप्लाई प्रभावित हुई और रिफाइनर्स को फिर से रूसी तेल खरीदने पर मजबूर होना पड़ा।
सूत्रों के मुताबिक, जब तक होर्मुज से शिपिंग प्रभावित रहेगी। तब तक अमेरिका की छूट जारी रहने की उम्मीद है। इससे भारत रियायती रूसी तेल का बड़ा खरीदार बना हुआ है और रूस को भी बढ़ती मांग और ऊंची कीमतों का फायदा मिल रहा है।
भारत सिर्फ रूस पर निर्भर नहीं रहना चाहता और अन्य देशों से भी तेल आयात के विकल्प तलाश रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल में वेनेजुएला से भारत का आयात 80 लाख बैरल तक पहुंच सकता है, जो अक्टूबर 2020 के बाद सबसे ज्यादा होगा।
यह रणनीति दिखाती है कि भारत अपनी ऊर्जा सप्लाई को विविध बना रहा है। जिससे किसी एक क्षेत्र या रूट पर निर्भरता कम हो। वैश्विक अस्थिरता के बावजूद भारत के बंदरगाहों पर लगातार तेल की सप्लाई पहुंच रही है।
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रूसी तेल से भरा टैंकर MT एक्वा टाइटन 22 मार्च को भारत पहुंचा और मैंगलुरु तट के पास लंगर डाले हुए है। इसके अलावा टेक्सास से LPG लेकर आया एक जहाज भी न्यू मैंगलोर पोर्ट पहुंचा है। जिससे सप्लाई की निरंतरता का संकेत मिलता है।
शिपिंग मंत्रालय के अनुसार, फारस की खाड़ी में मौजूद सभी 22 भारतीय जहाज और 611 भारतीय नाविक पूरी तरह सुरक्षित हैं। किसी भी भारतीय बंदरगाह पर जाम की स्थिति नहीं है और अधिकारी लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं।
14 मार्च से 31 मार्च के बीच न्यू मैंगलोर पोर्ट ने कच्चे तेल और LPG की खेपों पर कार्गो शुल्क माफ कर दिया है। जिससे आयात प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के जारी रह सके।
इस बीच जग लाडकी नाम का कच्चा तेल टैंकर मुंद्रा पोर्ट पहुंच चुका है, जबकि MT शिवालिक और MT नंदा देवी LPG कैरियर्स भी सफलतापूर्वक भारत पहुंचे हैं। इन जहाजों में करीब 92,712 मीट्रिक टन LPG था। यह देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा।