
अधिग्रहण फाइनेंसिंग में बढ़ी घरेलू बैंकों की ताकत (Img- AI)
New Delhi: भारतीय बैंकों के लिए कॉरपोरेट कंपनियों के अधिग्रहण यानी टेकओवर के कारोबार में बड़ा अवसर खुला है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए नियम 1 जुलाई 2026 से लागू होने के बाद घरेलू बैंकों ने एक दर्जन से अधिक मर्जर और अधिग्रहण (M&A) सौदों के लिए 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग की है।
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, अधिग्रहण के लिए कर्ज देने का संभावित बाजार करीब 2 लाख करोड़ रुपये का है। अब तक इस क्षेत्र में विदेशी बैंकों, प्राइवेट क्रेडिट फंड और कंपनियों के अपने पैसे की बड़ी भूमिका रही है। नए नियमों से भारतीय बैंकों को भी इस कारोबार में हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका मिला है।
पहले घरेलू बैंकों के लिए कंपनियों के अधिग्रहण को सीधे फंड करना आसान नहीं था। ऐसे सौदों के लिए कंपनियां विदेशी बैंकों, प्राइवेट क्रेडिट फंड और अपने आंतरिक संसाधनों पर निर्भर रहती थीं। अब आरबीआई के नए ढांचे के तहत पात्र घरेलू बैंक किसी कंपनी के अधिग्रहण की स्वतंत्र रूप से तय की गई कीमत का अधिकतम 75 प्रतिशत तक फाइनेंस कर सकते हैं।
यह सुविधा लिस्टेड और अनलिस्टेड कंपनियों के पात्र अधिग्रहणों पर लागू हो सकती है। हालांकि, इसके लिए वित्तीय योग्यता, जोखिम प्रबंधन और कर्ज की सीमा से जुड़ी शर्तों का पालन जरूरी है।
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इस नए कारोबार में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की सक्रियता सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक, बैंक करीब एक दर्जन अधिग्रहण सौदों में शामिल रहा है। इनमें कुछ सौदे पूरे हो चुके हैं, जबकि कुछ अभी प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में हैं। इसके अलावा एचडीएफसी बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक और आरबीएल बैंक भी अधिग्रहण फाइनेंसिंग के क्षेत्र में सक्रिय हुए हैं। इससे घरेलू बैंकों के लिए कॉरपोरेट कर्ज के एक नए सेगमेंट में कारोबार बढ़ाने की संभावना बनी है।
अधिग्रहण फाइनेंसिंग में विदेशी बैंकों की भी मजबूत मौजूदगी बनी हुई है। हाल के सौदों में एचएसबीसी, सिटीबैंक, एमयूएफजी और बार्कलेज जैसे अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने भी भागीदारी की है। नए नियमों से भारतीय बैंक अब उन सौदों में ज्यादा सक्रिय हो सकते हैं, जिनके लिए पहले कंपनियां विदेशी फंडिंग या दूसरे वित्तीय विकल्प तलाशती थीं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी बैंकों का बाजार खत्म हो जाएगा। बड़े सौदों में कर्ज देने की क्षमता, जोखिम का आकलन और कीमत तय करने की शर्तें आगे भी महत्वपूर्ण रहेंगी।
कोटक महिंद्रा बैंक में कॉरपोरेट और ट्रांजैक्शन बैंकिंग की प्रमुख अनु अग्रवाल के मुताबिक, अधिग्रहण फाइनेंसिंग की मांग बढ़ रही है। उनके अनुसार, जुलाई के बाद से विभिन्न बैंकों के साथ एक दर्जन से अधिक सौदों पर काम हुआ है। सौदे के आकार के आधार पर बैंक अपनी बैलेंस शीट से पूरी फंडिंग कर सकता है या दूसरे बैंकों के साथ मिलकर कर्ज उपलब्ध करा सकता है। इस प्रक्रिया को अंडरराइटिंग और सिंडिकेशन कहा जाता है।
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सूत्रों के मुताबिक, अधिग्रहण फाइनेंसिंग से जुड़े सौदों में क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन द्वारा एफएमसी कॉर्पोरेशन के भारतीय कारोबार का 2,268 करोड़ रुपये में अधिग्रहण शामिल है। इसके अलावा वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज ने एसोसिएटेड पावर स्ट्रक्चर्स में 55 प्रतिशत हिस्सेदारी 1,225 करोड़ रुपये में हासिल की।
टाटा ऑटोकॉम्प सिस्टम्स से जुड़े अधिग्रहण की फाइनेंसिंग भी ऐसे सौदों में शामिल बताई गई है। कुल मिलाकर, आरबीआई के नए नियमों ने भारतीय बैंकों के लिए अधिग्रहण के वित्तपोषण का नया अवसर खोला है। आने वाले समय में इस क्षेत्र की वृद्धि सौदों की मांग, पात्रता और बैंकों के जोखिम आकलन पर निर्भर करेगी।
Location : New Delhi
Published : 22 October 2026, 12:53 PM IST