चार साल से क्यों नहीं दमक रहे हीरे के दाम, क्या डायमंड इन्वेस्टमेंट अब भी फायदे का सौदा?

पिछले 4 सालों में प्राकृतिक हीरों के दाम 52% तक गिर चुके हैं। क्रूड ऑयल और सोने की कीमतें जहां आसमान छू रही हैं, वहीं डायमंड मार्केट धड़ाम हो गया है। जानिए कैसे डी बीयर्स के मार्केटिंग जाल और लैब-ग्रोन हीरों ने हीरों के 'दुर्लभ' होने का भ्रम तोड़ा और निवेशकों को भारी नुकसान पहुंचाया।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 26 October 2026, 11:25 AM IST

New Delhi: दुनियाभर के बाजारों में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां क्रूड ऑयल (कच्चा तेल) और सोने जैसी बहुमूल्य चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हीरों की चमक चार साल से फीकी पड़ी है। आइए जानते हैं कि इस गिरावट के पीछे की सच्चाई क्या है और क्या हीरों में निवेश करने वालों को कोई रिटर्न मिला है या नहीं।

प्राकृतिक हीरों की कीमतों में ऐतिहासिक गिरावट

पिछले चार से पांच सालों में नेचुरल डायमंड्स के दामों में भारी भूचाल आया है। कीमतें लगभग 51% से 52% तक नीचे गिर चुकी हैं। वैश्विक बाजार के आंकड़ों पर नजर डालें तो जो 1-कैरेट का प्राकृतिक हीरा साल 2021 में करीब 8,007 डॉलर (लगभग 6.7 लाख रुपये) का मिलता था, वह अब 2026 में लुढ़क कर औसतन 3,898 डॉलर (लगभग 3.2 लाख रुपये) पर आ गया है। हीरे के थोक बाजार में यह गिरावट पिछले 20 सालों के सबसे निचले स्तर पर है। ऐसे में जिन लोगों ने इसे निवेश के रूप में खरीदा था, उन्हें भारी निराशा हाथ लगी है और उनका रिटर्न लगभग शून्य या घाटे में बदल चुका है।

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दुकान पर क्यों नहीं मिल रहा भारी डिस्काउंट?

भले ही थोक बाजार में हीरे आधे दाम पर बिक रहे हों, लेकिन जब आम ग्राहक दुकान पर अंगूठी या हार खरीदने जाता है, तो उसे यह सस्ता नहीं मिलता। इसकी मुख्य वजह यह है कि हीरे हमेशा सोने या प्लैटिनम में जड़े जाते हैं और वर्तमान में सोने के दाम  रिकार्ड ऊंचाई बनाने के भले ही गिर रहे हैं परन्तु अभी आम आदमी की पहुंच से बाहर है। ज्वेलरी बनाने की लागत (मेकिंग चार्ज), डिजाइनिंग का खर्च और शोरूम का मुनाफा पहले की तरह ही जुड़ा रहता है। हां, अगर कोई कम कीमत में हीरा पहनना चाहता है, तो उसके लिए 'लैब-ग्रोन' (लैब में बने) हीरे एक शानदार विकल्प बन चुके हैं। प्राकृतिक हीरों की तुलना में ये 85% से 90% तक सस्ते हैं। जहां नेचुरल डायमंड लाखों का आता है, वहीं उसी क्वालिटी का 1-कैरेट का लैब-ग्रोन हीरा महज 30,000 से 40,000 रुपये में मिल जाता है।

कैसे तैयार होता है हीरा और क्या है इसकी हकीकत?

हीरा असल में शुद्ध कार्बन का ही एक रूप है, जो दो अलग-अलग तरीकों से तैयार होता है-

प्राकृतिक तरीका: जमीन से करीब 150 किलोमीटर नीचे, अत्यधिक तापमान (लगभग 1200°C) और भारी दबाव के बीच कार्बन के परमाणु क्रिस्टल का रूप ले लेते हैं। इस प्रक्रिया में करोड़ों साल लगते हैं और ज्वालामुखी विस्फोट के जरिए ये जमीन की सतह के पास आते हैं, जिन्हें बाद में खदानों से निकाला जाता है।

डायमंड (सोर्स- Pinterest)

लैब-ग्रोन तरीका: वैज्ञानिक इसे आधुनिक मशीनों (HPHT और CVD तकनीकों) की मदद से सिर्फ कुछ हफ्तों में तैयार कर लेते हैं। लैब में भी बिल्कुल प्राकृतिक जैसा माहौल बनाकर गैसों के जरिए हीरा उगाया जाता है। रासायनिक और भौतिक रूप से यह 100% असली हीरे जैसा ही होता है, इसलिए इसे नकली नहीं कहा जा सकता।

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क्या 'बेशकीमती' होने का दावा सिर्फ एक मार्केटिंग जाल था?

काफी हद तक यह सच है कि हीरों के 'बेहद दुर्लभ' और 'बेशकीमती' होने का एक बड़ा भ्रम फैलाया गया था। 20वीं सदी में 'डी बीयर्स' नामक कंपनी ने दुनिया की लगभग, सभी खदानों पर कब्जा कर लिया था और बाजार में हीरों की सप्लाई को जानबूझकर नियंत्रित रखा ताकि कीमतें आसमान पर रहें। साल 1947 में उन्होंने "हीरा है सदा के लिए" (A Diamond is Forever) का नारा देकर इसे इंसानी भावनाओं, प्यार और शादी से जोड़ दिया, जिससे सगाई में हीरे की अंगूठी देने का चलन पूरी दुनिया में फैल गया।

लेकिन अब चीन और भारत जैसे देशों में फैक्ट्रियों के जरिए असीमित मात्रा में बेहतरीन क्वालिटी के लैब-ग्रोन हीरे बनने लगे हैं। इससे हीरों की तथाकथित 'दुर्लभता' का प्रीमियम पूरी तरह खत्म हो गया है और प्राकृतिक हीरों का बाजार धड़ाम हो गया है।

Location :  New Delhi

Published :  26 October 2026, 11:21 AM IST