बरेली में डकैती के एक मामले में करीब आधी उम्र जेल में गुजार चुके मैनपुरी जिले के 45 वर्षीय आज़ाद खां को आखिरकार न्याय मिल गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने के बावजूद कानूनी औपचारिकताओं और अड़चनों के चलते रिहाई में देरी हुई।

आजाद खां
Bareilly: बरेली में डकैती के एक मामले में करीब आधी उम्र जेल में गुजार चुके मैनपुरी जिले के 45 वर्षीय आज़ाद खां को आखिरकार न्याय मिल गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने के बावजूद कानूनी औपचारिकताओं और अड़चनों के चलते रिहाई में देरी हुई, लेकिन जेल प्रशासन और एनजीओ की मदद से बुधवार शाम आज़ाद को बरेली सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया। मैनपुरी जिले के एलाऊ थाना क्षेत्र स्थित मोहल्ला ज्योति कटार निवासी आज़ाद खां को वर्ष 2002 में मैनपुरी की विशेष अदालत ने डकैती और गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
इसके साथ ही 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था, जिसे अदा न करने पर दो वर्ष का अतिरिक्त कारावास निर्धारित किया गया। इसके अलावा वर्ष 2001 में मैनपुरी के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (कोर्ट नंबर-4) ने आर्म्स एक्ट और जानलेवा हमले के एक अन्य मामले में आज़ाद को 10 वर्ष की सजा और 7 हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया था। जुर्माना न देने पर एक वर्ष की अतिरिक्त सजा भी सुनाई गई थी।
सजा के दौरान आज़ाद पहले फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में बंद रहा, जहां से वर्ष 2003 में उसे बरेली सेंट्रल जेल स्थानांतरित किया गया। इस बीच आज़ाद की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील दाखिल की गई थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों और चश्मदीद गवाहों के अभाव में 19 दिसंबर 2025 को डकैती के मामले में आज़ाद खां को दोषमुक्त करार दे दिया। वहीं, आर्म्स एक्ट और जानलेवा हमले के मामले में दी गई सजा वह पहले ही पूरी कर चुका था।
करीब दो दशकों तक जेल की सलाखों के पीछे जीवन बिताने के बाद अब 45 वर्षीय आज़ाद खां को आखिरकार आज़ादी नसीब हुई। न्याय की इस लंबी प्रक्रिया ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं कि वर्षों तक जेल में बंद रहने के बाद निर्दोष साबित होने वालों के जीवन की भरपाई कौन करेगा।