देश में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य को लेकर विवाद मचा हुआ है। अन्य मठों के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को शंकराचार्य नहीं मानते हैं। इनके शंकराचार्य बनने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है। दरअसल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने गुरु के निधन के बाद खुद को ही शंकराचार्य घोषित कर लिया था।

ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य को लेकर मचा विवाद
प्रयागराज: देश में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य को लेकर विवाद मचा हुआ है। दरअसल 18 जनवरी को मौनी अमावस्या स्नान पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान नहीं करने दिया गया जिस पर बवाल मचा हुआ है। जानते हैं देश में कितने मठ हैं और इनके शंकराचार्य कौन हैं।
शारदा मठ सबसे प्रमुख माना गया है। यह मठ गुजरात के द्वारका में स्थित है। इसके अलावा कश्मीर के शारदा गांव में एक प्राचीन ज्ञान केंद्र है। साथ ही केरल में श्री नारायण गुरु और कोलकाता रामकृष्ण मठ से संबंधित मठ है। यह विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित मठ है और आध्यात्मिक शिक्षा व सेवा प्रदान करते हैं। शारदा मठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती हैं।
भारत में चार प्रमुख मठ हैं, जिनकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में स्थापित किया था। उत्तर भारत के उत्तराखंड के चमोली जिले में ज्योतिर्मठ है। इसके वर्तमान में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं। हालांकि, इनके शंकराचार्य को लेकर विवाद बना हुआ है। अन्य मठों के शंकराचार्य इनको शंकराचार्य नहीं मानते हैं। इनके शंकराचार्य बनने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है। इन्होंने अपने गुरु के निधन के बाद खुद को शंकराचार्य घोषित कर लिया था।
श्रृंगेरी मठ दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले के तुंगा नदी के किनारे स्थित है। इसको श्रृंगेरी शारदा पीठम भी कहते हैं। इसके शंकराचार्य भारती तीर्थ पीठ हैं। ये भी अपना अहम स्थान रखता है।
गोवर्धन मठ भारत के ओडिशा राज्य के पुरी में स्थित है। यह पूर्व दिशा में स्थित है। यह अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करता है। इसके शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती है।
शंकराचार्य बनने की राह है कठिन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य ने मठों की शुरुआत की थी। वह हिंदू दार्शनिक और धर्मगुरु थे, इन्हें जगद्गुरु के नाम से भी जाना जाता है। जिसके लिए उन्होंने अपने प्रमुख चार शिष्यों को देश में चार दिशाओं में स्थापित किए गए मठों की जिम्मेदारी दी। इन मठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा जाता है। शंकराचार्य को सनातन धर्म में सर्वोच्च माना जाता है।
जो भी शंकराचार्य बनता है उसे त्यागी, दंडी संन्यासी, संस्कृत, चतुर्वेद, वेदांत ब्राह्मण, ब्रह्मचारी और पुराणों का ज्ञान होना बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही शंकराचार्य को अपने गृहस्थ जीवन को त्यागना, मुंडन, पिंडदान और रुद्राक्ष धारण करना काफी अहम होता है। शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य है। साथ ही चारों वेद और छह वेदांगों का ज्ञाता होना जरूरी है।
शंकराचार्य बनने के लिए अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति जरूरी है। साथ ही काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति की मुहर भी अनिवार्य है। इसके बाद ही शंकराचार्य की उपाधि मिलती है।
आदि शंकराचार्य ने देश में जिन चार मठों की स्थापना की थी। उसमें से एक उत्तर भारत के उत्तराखंड के चमोली जिले में ज्योतिर्मठ है। इसके वर्तमान में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं जिनको लेकर विवाद चल रहा है।
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अन्य मठों के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को शंकराचार्य नहीं मानते हैं। इनके शंकराचार्य बनने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है। दरअसल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने गुरु के निधन के बाद खुद को ही शंकराचार्य घोषित कर लिया था।