Birthday Special: कभी घर पर गाया था संस्कृत श्लोक, फिर बनीं भक्ति संगीत की पहचान; जानिए अनुराधा पौडवाल की अनसुनी कहानी

हिंदी संगीत जगत की मशहूर गायिका अनुराधा पौडवाल आज 27 अक्टूबर को 72 साल की हो गई हैं। संगीत सफर में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह आवाज आगे चलकर करोड़ों लोगों की पसंद बन जाएगी।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 27 October 2026, 12:21 PM IST

New Delhi: हिंदी संगीत जगत की मशहूर गायिका अनुराधा पौडवाल आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उनकी आवाज ने कभी प्रेम गीतों से लोगों के दिलों को छुआ, तो कभी भजनों के जरिए घर-घर में अपनी खास जगह बनाई। 27 अक्टूबर 1954 को जन्मीं अनुराधा पौडवाल 72 साल की हो गई हैं। पांच दशक से अधिक के संगीत सफर में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और कई पीढ़ियों के लोगों को अपनी आवाज का दीवाना बनाया।

एक संस्कृत श्लोक से शुरू हुआ फिल्मी सफर

अनुराधा पौडवाल की जिंदगी का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने फिल्मी गायन की शुरुआत किसी बड़े रोमांटिक गाने से नहीं, बल्कि संस्कृत श्लोक से की थी। वर्ष 1973 में आई फिल्म ‘अभिमान’ के लिए उन्होंने शिव स्तुति ‘ओंकारं बिंदुसंयुक्तं’ की एक शुरुआती रिकॉर्डिंग की थी। संगीतकार एस. डी. बर्मन को उनकी आवाज पसंद आई और यहीं से उनके लिए फिल्मी दुनिया के दरवाजे खुलने लगे। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह आवाज आगे चलकर करोड़ों लोगों की पसंद बन जाएगी।

संस्कृत श्लोक गाकर की थी शुरूआत( file photo)

‘आशिकी’ ने बदल दी किस्मत

अनुराधा पौडवाल के करियर में वर्ष 1990 की फिल्म ‘आशिकी’ एक बड़ा मोड़ साबित हुई। इस फिल्म के ‘नजर के सामने’, ‘बस एक सनम चाहिए’ और ‘धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना’ जैसे गाने बेहद लोकप्रिय हुए। इसके बाद ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘साजन’ और ‘बेटा’ जैसी फिल्मों के गीतों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। ‘धक-धक करने लगा’ गाने को भी आज तक याद किया जाता है।

पुरस्कारों से सजा संगीत का सफर

अनुराधा पौडवाल को अपने गायन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। वर्ष 1989 में मराठी फिल्म ‘कलात नकळत’ के गीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। वर्ष 2017 में भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

फिल्मी गीतों से भजनों तक का अनोखा सफर

उनकी एक बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने फिल्मी गीतों के साथ भक्ति संगीत में भी मजबूत पहचान बनाई। ‘जय अम्बे गौरी’, ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ और माता की भेंटों जैसे भक्ति गीतों ने उन्हें घर-घर तक पहुंचाया। उन्होंने हिंदी के अलावा कई भारतीय भाषाओं में भी गाने रिकॉर्ड किए। टी-सीरीज के साथ उनके काम ने भक्ति संगीत को बड़ी संख्या में लोगो तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

निजी जिंदगी में भी झेले कठिन दौर

अनुराधा पौडवाल की जिंदगी केवल सफलता की कहानी नहीं है। वर्ष 1991 में उनके पति और संगीतकार अरुण पौडवाल का निधन हो गया। बाद में उन्होंने अपनी 25 दिन की बेटी को खोने का दुख भी झेला। वर्ष 2020 में उनके बेटे आदित्य पौडवाल का 35 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। इन दुखद घटनाओं के बावजूद संगीत उनके जीवन का अहम हिस्सा बना रहा।

आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है आवाज

अनुराधा पौडवाल की कहानी बताती है कि एक कलाकार की पहचान केवल पुरस्कारों से नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में उसकी जगह से बनती है। रोमांटिक गीतों से लेकर भक्ति संगीत तक, उनकी आवाज ने संगीत की दो अलग-अलग दुनिया में अपनी छाप छोड़ी। जन्मदिन के मौके पर उनके चाहने वाले उनके गीतों और भजनों को याद कर रहे हैं।

Location :  New Delhi

Published :  27 October 2026, 12:21 PM IST