सिने रंग फाउंडेशन के लघु सिनेमा महोत्सव में तिग्मांशु धूलिया ने प्रशिक्षण, रंगमंच और नई पीढ़ी के सिनेमा पर तीखी राय रखी। वहीं पुरस्कार समारोह में कई फिल्मों और कलाकारों को सम्मानित किया गया। कलाकारों से काम लेना, फ्रेम की समझ, सीन की टाइमिंग और भावनाओं को पकड़ना थिएटर से सीखा जा सकता है।

लघु सिनेमा महोत्सव
Lucknow: सिनेमा की दुनिया में सपनों की चमक जितनी तेज होती है। उसके पीछे की सच्चाई उतनी ही कड़वी और खौफनाक भी है। यहां एक गलत फैसला करियर का कत्ल कर सकता है और अधूरा ज्ञान हुनर की लाश बनकर रह जाता है। ऐसे ही सख्त और बेबाक शब्दों में जाने-माने फिल्म निर्देशक और लेखक तिग्मांशु धूलिया ने नई पीढ़ी के फिल्मकारों को आईना दिखाया। मौका था सिने रंग फाउंडेशन द्वारा आयोजित लघु सिनेमा महोत्सव के दूसरे दिन का, जहां विमर्श सत्र में उन्होंने सिनेमा की पढ़ाई, भविष्य और मौजूदा दौर पर खुलकर बात की।
प्रशिक्षण पर खरी-खरी
विमर्श के दौरान अमित कुमार से बातचीत में तिग्मांशु धूलिया ने साफ कहा कि फिल्मों में आने के लिए किसी बड़े और भरोसेमंद संस्थान से प्रशिक्षण लेना बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक बिना प्रशिक्षण के फिल्म निर्माण की किसी भी विधा में सफलता की संभावना बहुत कम हो जाती है। जो काम बनता भी है, वह उत्कृष्ट नहीं हो पाता। उन्होंने इसे सिनेमा का बुनियादी अपराध बताया। जहां लोग शॉर्टकट के चक्कर में कला के साथ समझौता कर लेते हैं।
रंगमंच से सिनेमा तक का सफर
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि रंगमंच से फिल्म में आने पर कई चीजें अपने आप आसान हो जाती हैं। कलाकारों से काम लेना, फ्रेम की समझ, सीन की टाइमिंग और भावनाओं को पकड़ना थिएटर से सीखा जा सकता है। उनके अनुसार रंगमंच कलाकार को अनुशासन और धैर्य सिखाता है, जो सिनेमा में लंबे समय तक टिकने के लिए जरूरी हथियार हैं।
नई पीढ़ी पर चिंता
तिग्मांशु धूलिया ने सिनेमा के भविष्य पर बात करते हुए कहा कि सिनेमा का भविष्य अभी भी मौजूद है लेकिन नई पीढ़ी से उन्हें ज्यादा उम्मीद नहीं दिखती। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी रील्स, शॉट्स और मोबाइल में उलझकर रह गई है। पढ़ना और सोचना लगभग छूट गया है, जबकि सिनेमा सोच और संवेदना की कला है।
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पुरस्कारों की शाम
कार्यक्रम के अगले सत्र में प्रदर्शित फिल्मों को सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार ‘प्लूटो’ को मिला। द्वितीय और तृतीय सर्वश्रेष्ठ फिल्म क्रमश ‘हैप्पी बर्थ डे’ और ‘मटर पनीर’ रहीं। सर्वश्रेष्ठ फिल्म श्रेणी में ‘सेकेंड चांस’ और ‘थाली’ को सांत्वना पुरस्कार दिया गया।
कलाकार और तकनीशियन सम्मानित
बेस्ट डायरेक्टर का पुरस्कार डॉ. चैतन्य प्रकाश को उनकी फिल्म ‘अनहोल्ड स्टोरी’ के लिए मिला। बेस्ट डेब्यू डायरेक्टर का सम्मान कुमारी सृष्टि को फिल्म ‘ऊंची ताक’ के लिए दिया गया। बेस्ट एक्टर का पुरस्कार आलोक सिंह राजपूत को फिल्म ‘अल्टर’ के लिए और बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार ‘सेकेंड चांस’ में मां की भूमिका निभाने वाली कलाकार को मिला। ‘मटर पनीर’ के तीनों बाल कलाकारों को बेस्ट चाइल्ड एक्टर और ‘डोपेस्टिक’ की बाल कलाकार को बेस्ट चाइल्ड एक्ट्रेस चुना गया। बेस्ट नेगेटिव रोल का पुरस्कार ‘अन्तस्थ’ के कलाकार को और बेस्ट राइटर का सम्मान अक्षय जाधव को दिया गया।