प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पीके मिश्र ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं सुनिश्चित करना, सार्वजनिक सेवाएं और सभी के लिए गरिमा विषय रहा।

राष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. पीके मिश्र का स्वागत
New Delhi: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रधान सचिव और सीनियर आईएएस अधिकारी डॉ. पीके मिश्र ने बुधवार को भारत मंडपम में आयोजित राष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। इस सम्मेलन का मुख्य विषय 'रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं सुनिश्चित करना, सार्वजनिक सेवाएं' था। इस अवसर पर डॉ. मिश्र ने लोकतांत्रिक देशों में मानवाधिकारों की अहमियत पर प्रकाश डाला और यह बताया कि कैसे संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाएं और सामाजिक मूल्य मानव गरिमा की रक्षा में एकजुट होते हैं। इसके साथ ही उन्होंने सरकार की योजनाओं से समाज में हो रहे सकारात्मक बदलाव और लोकहित के बारे में भी विस्तार से बताया।
"कार्यान्वित अधिकारों" की ओर एक बदलाव
डॉ. मिश्र अपने संबोधन में कहा कि भारत ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम, एमजीएनआरईजीए और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे कानूनों के माध्यम से विकास के लिए अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को अपनाया। उन्होंने कहा कि 2014 से, सरकार ने एक व्यापक दृष्टिकोण पर जोर दिया है, यह सुनिश्चित करते हुए कि कोई भी पात्र लाभार्थी छूट न जाए। यह "कागजी अधिकारों" से "कार्यान्वित अधिकारों" की ओर एक बदलाव का प्रतीक है, जिसे डिजिटल इंफ्रास्टक्चर, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और विकसित भारत संकल्प यात्रा जैसे जागरूकता अभियानों का समर्थन प्राप्त है।
नई दिल्ली के भारत मंडपम में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा मानवाधिकार दिवस सम्मेलन का आयोजन
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गरीबी उन्मूलन मानवाधिकार का सबसे प्रभावी क्रियाकलाप है, जिसके तहत पिछले दशक में 25 करोड़ भारतीयों को गरीबी से बाहर निकाला गया है, जिसकी पुष्टि घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 से होती है।
डॉ. पीके मिश्र ने कही ये बड़ी बात
डॉ. पीके मिश्र ने कहा कि मानवाधिकार दिवस केवल एक ऐतिहासिक घोषणा का स्मरणोत्सव नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन के अनुभवों पर चिंतन करने का एक निमंत्रण है। आज के दौर में मानवाधिकारों का राजनीतिक और नागरिक अधिकारों तक सीमित नहीं है। बल्कि यह डिजिटल समावेशन, पर्यावरणीय न्याय और प्रौद्योगिकी से जुड़े नए पहलुओं तक फैल चुका है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों के लिए मानवाधिकार दिवस खास महत्व रखता है। यह दिवस केवल एक स्मरणोत्सव नहीं है।
मानवाधिकार दिवस पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में एनएचआरसी के सदस्य
डॉ. मिश्र ने भारत की ऐतिहासिक भूमिका को भी याद किया। डॉ. हंसा मेहता ने कहा कि मानवाधिकार घोषणापत्र में यह सुनिश्चित किया कि सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं, जो महिला-पुरुष समानता के दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। आज मानवाधिकारों का मतलब केवल नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से नहीं है। इसमें सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार भी शामिल हैं। इसके साथ ही, आज के समय में यह डिजिटल प्रौद्योगिकियों, पर्यावरणीय चिंताओं और नई कमजोरियों तक फैल चुका है।
डॉ. मिश्र ने कहा कि हमारे संविधान में धर्म, न्याय, करुणा, सेवा और अहिंसा जैसे सिद्धांतों को शामिल किया गया है, जिनसे कल्याण और उचित आचरण को बढ़ावा मिलता है। इन सिद्धांतों ने भारतीय संविधान को आकार दिया। जिसमें सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका जैसे अधिकारों को प्राथमिकता दी गई है। डॉ. मिश्र ने कहा कि 2014 के बाद सरकार ने एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया है। जिससे यह सुनिश्चित किया गया है कि कोई भी पात्र लाभार्थी छूट न जाए। यह बदलाव कागजी अधिकारों से कार्यान्वित अधिकारों की ओर बढ़ा है।
घर में सम्मान: आवास, जल, स्वच्छता, बिजली और स्वच्छ ईंधन के माध्यम से जीवन स्तर को बेहतर बनाना। प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत अभियान, सौभाग्य और उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने लाखों लोगों का जीवन बदल दिया है।
सामाजिक सुरक्षा: प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और आयुष्मान भारत (PMJAY) जैसी योजनाओं ने कोविड-19 के दौरान 80 करोड़ लोगों को भोजन उपलब्ध कराया। 42 करोड़ नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की। बीमा, पेंशन और श्रम सुधारों से गिग और अनौपचारिक कामगारों को भी मदद मिली है।
समावेशी आर्थिक विकास: वित्तीय समावेशन और सशक्तिकरण के माध्यम से भारतीयों के जीवन में सुधार। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और प्रधानमंत्री स्वनिधि जैसी योजनाओं ने उद्यमिता को बढ़ावा दिया है। महिला सशक्तिकरण के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं, जैसे कि स्वयं सहायता समूह और महिला आरक्षण।
न्याय और कमजोर समुदायों की रक्षा: नए आपराधिक कानून संहिताओं, विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम और आदिवासी समुदायों के लिए पीएम-जनमान अधिनियम के माध्यम से न्याय सुनिश्चित किया गया है। भारत के विदेशों में मानवाधिकार के मामले में भी सक्रिय प्रयास किए गए हैं, जैसे वैक्सीनेशन मैत्री।
भविष्य की चुनौतियां
नई दिल्ली में आयोजित एनएचआरसी के मानवाधिकार दिवस सम्मेलन में खचाखच भरा हॉल
डॉ. मिश्र ने आगे कहा कि भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, लेकिन इसके लिए आने वाली चुनौतियों का सामना करना होगा। जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय न्याय, डेटा सुरक्षा, एल्गोरिदम निष्पक्षता और डिजिटल निगरानी जैसी समस्याएं महत्वपूर्ण होंगी। इसके अलावा, गिग वर्क की बढ़ती समस्याएं और तकनीकी बदलाव के कारण नई कमजोरियां भी उत्पन्न हो सकती हैं। अंत में यह कहा कि सुशासन भी एक मौलिक अधिकार है, जिसे दक्षता, पारदर्शिता, शिकायत निवारण और समय पर सेवा वितरण से परिभाषित किया जा सकता है।