Bengal Election: देखिये पश्चिम बंगाल में भाजपा का कौन-कौन दिग्गज हारा चुनाव? क्या रही वजह? सटीक विश्लेषण

सुभाष रतूड़ी

पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव के परिणामों में बंगाल में ममता बनर्जी की लगातार तीसरी जीत ने देश को एक साथ कई संदेश दे दिये हैं। बंगाल चुनाव में भाजपा के दिग्गज नेताओं की हार ने सभी को इसके कारण जानने के लिये विविश कर दिया है। पढिये डाइनामाइट न्यूज की स्पेशल रिपोर्ट

भाजपा की टॉप लीडरशिप भी दिग्गजों की हार पर मंथन को विवश (फाइल फोटो)
भाजपा की टॉप लीडरशिप भी दिग्गजों की हार पर मंथन को विवश (फाइल फोटो)


नई दिल्ली: पांच राज्यों में हुए विधान सभा चुनाव के बाद सियासी तस्वरें अब साफ हो चुकी है। बंगाल के चुनाव परिणामों ने देश को कई तरह के संदेश एक साथ दे दिये हैं। भाजपा की भारी भरकम टीम, टॉप लीडरशिप और पूरी ताकत भी अकेली ममता बनर्जी की जीत को न रोक सकी। ममता की अगुवाई में टीएमसी ने तीसरी बार जिस शानदार तरीके से जीत की हैट्रिक लगाई, उसने कई राजनीतिक विशलेषकों को इस चुनाव परिणाम पर सोचने-विचारने को मजबूर कर दिया है। भाजपा ने कई दिगग्जों को भी मैदान में उतारा लेकिन लगभग हर किसी को ममता के तूफान के सामने शिकस्त झेलनी पड़ी। 

भाजपा की ये ताकतें भी न आई काम  

बंगाल चुनाव के दौरान देश की राजनीति में पहली बार ऐसा परिदृश्य भी देखने को मिला, जब केंद्र समेत कई राज्यों में सत्ताधारी किसी राष्ट्रीय पार्टी (भाजपा) को एक क्षेत्रीय दल (टीएमसी) को हराने के लिये सारे हथियार आजमाने पड़े हों। नेताओं की लंबी-चौड़ी फौज और सारे साम, दाम, दंड, भेद अपनानने के बावजूद भी भाजपा बंगाल की सत्ता से दूर रह गई। हालांकि, यह भी सच है कि बंगाल कभी भी भाजपा की जमीन नहीं रही। लेकिन भाजपा ने जो ताकत इस चुनाव में झौंकी, वह अमूमन आज तक किसी चुनाव में नहीं देखी गई। हालांकि, भाजपा को उसके इस भागीरथ प्रयास का यह फायदा हुआ कि वह राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई लेकिन बंगाल जीत का सपना उसका चकनाचूर हो गया और वह दो अंकों में ही सिमटकर रही गई। 

आत्ममुग्ध भाजपा इन वोटरों को समझने में रही विफल  

अब सबसे बड़ा सवाल यहा है कि बंगाल चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई मुख्यमंत्रियों व केंद्रीय मंत्रियों के हैवीवेट चुनाव प्रचार और सत्ताधारी दल में बड़े स्तर पर सेंधमारी के बाद भी भाजपा से आखिर कहां पर चूक हुई? जिसके कारण वह सत्ता से दूर रह गई। इस सवाल का जबाव कुछ हद तक भाजपा के पास और कुछ बंगाल की जनता के पास है। भाजपा अपने आंतरिक आंकलन के आधार पर हर बार 200+ सीटें जीतने का दावा करती रही और इस दावे को ही वह जीत मानकर आत्ममुग्ध हो गई। वह बंगाल के उन साइलेंट वोटर की नब्ज टटोलने और उसे रिझाने में पूरी तरह असफल रही, जो खामोशी से ईवीएम का बटन दबाकर अपना फैसला सुनाता है। 

कट्टरता और आक्रामकता की विफलता 

बंगाल चुनाव में बड़े स्तर वोटों के धुव्रीकरण की चाल भी कुछ हद तक भाजपा को भारी पड़ी। हिंदुत्व और राम नाम पर भाजपा कई बार आक्रामक दिखी, जिससे लगता है कि अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का भाव घर करता रहा। थोड़ा-बहुत जो अल्पसंख्यक वोटर भाजपा की तरफ मुड़ने की सोच भी रहे थे, पार्टी की आक्रामकता को दखकर उन्होंने भी अपना विचार बदल दिया।

ममता बनर्जी के काली पाठ जैसे मुद्दों पर तंज कसने से भी कुछ वोटरों में भाजपा को लेकर असंतुष्टि का भाव देखा गया। हालांकि भाजपा ने पूरे हिंदुत्व वोट बैंक पर कब्जा करने की कई कोशिशें की लेकिन सॉफ्ट हिंदुत्व वाले वोटरों को भाजपा की यह आक्रामकता पसंद नहीं आयी। भाजपा लगातार ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस पर तुष्टीकरण का भी आरोप लगाती रही, लेकिन बंगाल के वोटरों को यह पसंद नहीं आया। 

दिग्गज दलबदलुओं से उठा वोटरों का भरोसा 

भाजपा ने बड़ी राजनीति तोड़फोड़ के बाद इन चुनावों में जिन दिग्गज चेहरों पर अपना दांव खेला, उनमें कई चेहरे टीएमसी में सेंधमारी के बाद भाजपा से जुड़े थे। पिछले दो सालों में टीएमसी के करीब एक दर्जन से ज्यादा विधायकों सहित 30 नेता भाजपा में शामिल हुए। इनमें सुवेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय जैसे कई नेता शामिल है। टीएमसी ने इसके लिये बीजेपी पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया। पार्टी ने इन नेताओं को दल-बदलू, धोखेबाज और मीर जाफर तक कहा। इन नेताओं को लेकर टीएमसी के बयानों ने जनता को जो संदेश दिया, उसका खामियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ा और वोटरों ने दलबदलुओं पर भरोसा नहीं किया। 

अंदरूनी कोल्ड वॉर सामने आने से फजीहत  

टीएमसी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए मुकुल रॉय और दिलीप घोष के बीच का अंदरूनी कोल्ड वॉर भी खुलकर जनता के सामने आ गया। इसी तरह के तमाम कारणों से भी जनता में दलबदलु नेताओं को लेकर असंतोष देखा गया। बीजेपी ने अपने चार सांसदों को विधानसभा चुनाव में उतारा था, जिनमें तीन को करारी मात मिली है और महज एक सांसद को ही जीत मिल सकी है। भाजपा के सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो, लॉकेट चटर्जी जैसे नेताओं का विधानसभा चुनाव लड़ने पर भी वोटरों को आश्चर्य हुआ। दलबदलुओं और मौकापरस्तों को वोटरों ने कोई तवज्जो नहीं दी। 

नंदीग्राम की घटना का फायदा

इसके अलावा एक्सपर्ट्स यह भी मानते हैं कि नंदीग्राम में कथित तौर पर चोटिल होने की घटना के बाद ममता बनर्जी बंगाल के लोगों से सहानुभूति वोट बटोरने में कामयाब रहीं और महिलाओं ने उन्हें बढ़-चढ़कर वोट दिया। अब जबकि ममता बनर्जी कल बंगाल में तीसरी बार सत्ता का सिंहासन संभालने जा रही है, ऐसे में भाजपा को अब यहां सत्ता संघर्ष के लिये पांच वर्षों का इंतजार करना पड़ेगा। 










संबंधित समाचार