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नई दिल्ली: भारत की संसदीय राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण आया है जब वक्फ संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया।
डाइनामाइट न्यूज संवादाता के अनुसार, अब राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद यह विधेयक कानून का रूप ले लेगा। यह बदलाव भारत के वक्फ कानूनों में बुनियादी सुधार लेकर आएगा। जिन पर अब तक बहुत कम सार्वजनिक चर्चा और पारदर्शिता रही है।
क्या है वक्फ और क्यों है यह विवाद
‘वक्फ’ एक इस्लामिक अवधारणा है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को धार्मिक या सामाजिक कार्यों के लिए ‘अल्लाह’ के नाम पर समर्पित कर देता है। भारत में वक्फ संपत्तियों की संख्या और उनका फैलाव बेहद विशाल है- करीब 9.4 लाख एकड़ भूमि, जिसकी अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ रुपये के करीब है। यह भूमि रक्षा मंत्रालय और रेलवे के बाद देश में सबसे ज्यादा है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इतनी संपत्ति के बावजूद भारत का आम मुसलमान आज भी आर्थिक रूप से पिछड़ा है। सवाल उठता है कि क्या वक्फ संपत्तियों का सही इस्तेमाल हो रहा है? क्या यह संपत्ति उनके ही हित में काम आ रही है, जिनके लिए इसे समर्पित किया गया था?
विधेयक में क्या हैं प्रमुख संशोधन?
दानकर्ता के लिए योग्यता: अब वक्फ संपत्ति वही व्यक्ति दान कर सकता है जो कम से कम पिछले पांच वर्षों से इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार जीवन यापन कर रहा हो।
बोर्ड में विविधता: वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक सदस्य और कम से कम दो महिला सदस्य शामिल किए जाएंगे।
पारदर्शिता और जवाबदेही: मुतवल्लियों (प्रबंधकों) के कार्यों की जांच को लेकर प्रावधान सख्त किए गए हैं। संपत्ति के दुरुपयोग और अनियमित किराया समझौतों पर रोक लगाने के उपाय भी विधेयक में शामिल हैं।
जानिए कब हुआ वक्फ का भारत में आगमन
भारत में वक्फ की शुरुआत मुस्लिम शासन के साथ हुई। पहली बार वक्फ प्रणाली का ज़िक्र कुतुबुद्दीन ऐबक के काल (1206) में मिलता है। बादशाहों और नवाबों ने कई गांव, मस्जिदें, दरगाहें और मदरसे वक्फ किए। शाहजहां ने शाहजहानाबाद और जामा मस्जिद जैसी संपत्तियों को वक्फ घोषित किया। दिलचस्प बात यह है कि हिंदू राजाओं ने भी कभी-कभी मुस्लिम प्रजा के धार्मिक कार्यों के लिए संपत्ति वक्फ में दी। छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके पूर्वजों के कुछ ऐसे दान दर्ज हैं।
कानूनी विकास और विवादों की जड़ें
1810 में ब्रिटिश शासन के दौरान वक्फ संपत्तियों में घोटालों की शिकायतें आने लगीं, जिसके चलते 1820 में टैक्स लगाया गया, पर विरोध के कारण 1859 में हटा लिया गया। ब्रिटिश सरकार ने 1913 में वक्फ बोर्ड की स्थापना की और 1923 में इसे कानूनी दर्जा मिल गया। आजादी के बाद 1954 में वक्फ कानून बना और फिर 1995 व 2013 में संशोधन हुए, जिनसे वक्फ बोर्ड को और शक्तियां मिल गईं लेकिन जवाबदेही की व्यवस्था कमजोर रही। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कानूनी व्यवस्थाओं के कारण आम नागरिकों को न्याय नहीं मिल पाया। कई बार यह देखा गया कि जिन संपत्तियों पर दशकों से लोग रह रहे थे, वे वक्फ घोषित कर दी गईं, जिससे भारी विवाद उत्पन्न हुए।
क्यों जरूरी था संशोधन?
वक्फ संपत्तियों को लेकर अनेक राज्य सरकारें भी उलझन में रहीं। भूमि रिकॉर्ड में संपत्ति निजी दिखती है, लेकिन जब बिक्री या निर्माण की बात आती है, तो वक्फ बोर्ड दावा कर देता है। इससे न्यायिक व्यवस्था में भी भ्रम की स्थिति बनी रही। संशोधित कानून इन समस्याओं को दूर करने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।
हरनाथ यादव ने रचा इतिहास
इस विधेयक को हरनाथ यादव भाजपा के लोकसभा सदस्य ने 8 अगस्त 2024 को एक प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में पेश किया था। शुरुआत में इस पर भारी विरोध हुआ, लेकिन बाद में इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को सौंपा गया। लंबी समीक्षा और बहस के बाद यह विधेयक 2 अप्रैल को लोकसभा और 3 अप्रैल को राज्यसभा से पारित हो गया। अब जबकि यह विधेयक संसद से पारित हो चुका है, अंतिम मोहर राष्ट्रपति की स्वीकृति से लगेगी। इसके बाद यह कानून बन जाएगा और भारत में वक्फ संपत्तियों का प्रशासन, उपयोग और प्रबंधन एक नई दिशा में जाएगा।
Published : 5 April 2025, 10:54 AM IST
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