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महराजगंज: महिला जिला पंचायत सदस्य अमरावती देवी के पुत्र जितेन्द्र यादव की लाश के अंतिम संस्कार के बाद यह मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी ने इस मामले को राज्यपाल के समक्ष पहुंचा दिया है।

सोशल मीडिया पर हत्याकांड की खबर को शेयर करते हुए लिखा गया है कि “विपक्ष के खून की प्यासी भाजपा सरकार लगातार समाजवादी पार्टी नेताओं पर अत्याचार कर हत्या करवा रही है।महाराजगंज में ‘सपा नेता जितेंद्र यादव की हत्या भाजपा विधायक बजरंग बहादुर सिंह द्वारा रचित साज़िश‘ मृतक परिजनों के आरोपों पर जाँच कराकर न्याय हो। राज्यपाल महोदया से दख़ल की अपील”
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दो महीने पहले हुए जानलेवा हमले के बाद जिस पुलिसिया नादानी का परिचय जिले के पुलिस महकमे के बड़े अफसरों ने दिया उसका नतीजा हत्या के रुप में सामने आया। हत्या के बाद से मुकदमा लिखने के नाम पर पुलिस की पैंतरेबाजी से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। जितने मुंह, उतनी बात, लोग सवाल पूछ रहे हैं कि पुलिस ने अगर अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभायी और रंजिश के चलते आगे भी गैंगवार में हत्याओं का दौर जारी रहा तो फिर क्या इसके जिम्मेदार वर्तमान पुलिस अफसर नहीं होंगे? क्यों पुलिस सत्ता के दबाव में काम कर रही है? सबसे बड़ा डर लोगों को यह है कि पुलिसिया नादानी के चलते यह रंजिश कहीं जातिगत संघर्ष का रंग न अख्तियार कर ले।
पुलिस ने सबसे बड़ा खेल किया मृतक की पत्नी की ओर से दी गयी सबसे पहली दो पन्ने की तहरीर को न दर्ज करके। यहीं से सारे विवाद की शुरुआत हुई। न जाने कैसे एक पन्ने की दूसरी तहरीर पर मुकदमा लिखा गया। परिजन इस तहरीर पर लिखे गये मुकदमे पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। जब विवाद बढ़ा तो पुलिस वालों ने कहा कि हम आगे की विवेचना में डीएम के नाम से लिखी गयी तीसरी तहरीर की बातों को शामिल करेंगे। इससे साफ हो गया कि पुलिस अपनी पैंतरेबाजी में कामयाब हो गयी और सत्ता के दबाव में जैसा चाहती थी वैसा कर ले गयी लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि 'लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पायी'
पुलिस इसी तरह सत्ता के दबाव में गरीबों को सताने में और अपराधियों को बचाने में जुटी रहेगी तो फिर गरीबों की सुनेगा कौन, कैसे उन्हें न्याय मिलेगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि दो महीने पहले जितेन्द्र यादव पर हुए जानलेवा हमले के बाद पुलिस ने सत्ता के दबाव में काम नहीं किया होता तो शायद आज किसी की जान नहीं जाती।
हैरान करने वाली बात तो ये है कि दो महीने पहले हुए जानलेवा हमले के बाद पुलिस ने जो 307 का केस दर्ज किया था उसमें 6 लोग मुलजिम बनाये गये लेकिन एक की भी गिरफ्तारी पुलिस नहीं कर पायी। इनमें से तीन लोगों ने अपनी मर्जी और समय से कोर्ट में सरेंडर किया। इस मामले में तीन लोग अभी भी पुलिसिया गिरफ्त से बाहर है। नतीजा अपराधियों के हौसले सत्ता और पुलिस के गठजोड़ में बढ़ते चले गये और आखिरकार हत्यारे जितेन्द्र को गोलियों से भून निर्मम हत्या करने में सफल हो गये।
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यहां एक और बात चौंकाने वाली है कि जैसे ही हत्या हो जाती है उसके तुरंत बाद दो लोगों को पुलिस अचानक गिरफ्तार कर लेती है। पुलिस का यह खेल किसी के गले नहीं उतर रहा है कि जो अभियुक्त 307 के केस में दो महीने से फरार थे और पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी वे अचानक हत्या के तुरंत बाद कैसे पुलिस के राडार में आ गये? कहीं ये सब पुलिसिया मिलीभगत का तो नतीजा नहीं? ये ऐसे सवाल है जिसकी व्यापक जांच होने पर ही दूध का दूध और पानी का पानी हो पायेगा।
Published : 11 December 2019, 6:00 PM IST
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