कानपुर में सैकड़ों वर्ष पुराना रहस्यमयी शिव मंदिर, जानिए क्या है खासियत

डीएन संवाददाता

सैकड़ो वर्ष पुराना कैलाशपति मन्दिर आज भी रहस्यमयी बना हुआ है। यहां पर भक्तों का सावन भर तांता लगा रहता है।

शिवालय में बना है सैकड़ों वर्ष पुराना रहस्यमयी शिव मंदिर
शिवालय में बना है सैकड़ों वर्ष पुराना रहस्यमयी शिव मंदिर

कानपुरयूपी के कानपुर में बड़े चौराहा स्थित कोतवाली से सटा शिवालय इलाके में बना कैलाशपति मंदिर अपने आप में अनूठा है। वैसे तो शिवालय मार्केट कानपुर शहर के अलावा हर जगह काफी प्रसिद्ध है लेकिन यहां मार्केट से कुछ ही दूरी पर बना ये सैकड़ो वर्ष पुराना कैलाशपति मन्दिर आज भी रहस्यमयी बना हुआ है। यहां पर भक्तों का सावन भर तांता लगा रहता है। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां का शिवलिंग सात फिट लंबा, छह फिट चौड़ा और पांच फीट ऊंचा है, पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसा शिवलिंग कहीं  देखने को नही मिलेगा। सफेद संगमरमर से बना और 108 सर्पों पर आधारित ये भव्य शिवलिंग पूरे प्रदेश में एक ही है।

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मंदिर के पुजारी कृष्णा कुमार शुक्ल शास्त्री ने डायनामाइट न्यूज़ से बातचीत के दौरान बताया कि यहां में  सोमवार को भक्तों भारी भीड़ देखने को मिलती है। उन्होंने बताया कि साल 1928 में राजस्थान से शिवलिंग की मूर्ति मंगवाकर कैलाश मन्दिर में स्थापित किया था। साथ ही उन्होंने बताया कि हम भी इस मंदिर की करीब 30 साल से सेवा कर रहे हैं और आज तक भोलेनाथ ने मुझ पर या मेरे परिवार पर किसी भी तरह की परेशानी नही आने दी।

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यह शिवलिंग आज भी बना हुआ है रहस्यमयी

इतना बड़ा शिवलिंग इतने छोटे दरवाजों के अंदर कैसे स्थापित हुआ, यह आज तक रहस्यमयी है। पुजारी ने बताया कि उस दौरान मन्दिर को संभालने की जिम्मेदारी का बीड़ा गुरुप्रसाद जी ने उठाया। जिसके बाद मन्दिर का निर्माण भी कुछ ही महीनों के भीतर करवा दिया। लेकिन राजस्थान से लाया हुआ इतने बड़े आकार का शिवलिंग उस दरवाज़े के अंदर जा नही पा रहा था, जिस जगह गुरुप्रसाद उस शिवलिंग को स्थापित करना चाहते थे। इस बीच शिवलिंग अंदर न पहुंचने पर गुरुप्रसाद काफी परेशान रहने लगे। शिवलिंग को अंदर पहुंचाने के लिए कारीगरों ने दरवाजा तोड़ने के लिए कहा तो गुरुप्रसाद ने साफ मना कर दिया कि दरवाज़ा नही तोड़ा जाएगा। जिसके बाद शिवलिंग कई दिनों तक हॉल में ही रखा रहा।

शंकराचार्य ने मन्दिर में हवन करवाने की सलाह दी

मन्दिर के ट्रस्टी अनिरुद्ध प्रसाद बाजपेयी ने बताया कि कैलाशपति मन्दिर में शिवलिंग अंदर स्थापित न होने के चलते जब ये बात शंकराचार्य को पता चली तो उन्होंने मन्दिर के बाहर 3 दिन का हवन कराने की सलाह दी। जिसके बाद मन्दिर के सभी मुख्य दरवाज़े बंद करवा दिए गए। ऐसा कहा जाता है कि 3 दिन तक दिन रात मन्दिर के बाहर हवन पूजन चलता रहा वही 3 दिन पूरे होने के बाद जैसे ही अंदर का दरवाजा खोला सभी लोग वहां का नज़ारा देख अचंभित हो उठे। गुरुप्रसाद शिवलिंग को जहां स्थापित करना चाहते थे,  शिवलिंग उसी जगह पर स्थापित हो गया। जो आज कैलाशपति मन्दिर के नाम से जाना जाता है। अभी भी लोगों के जेहन में सवाल ये है कि इतने बड़े आकार का ये शिवलिंग ऐसे पतले और छोटे दरवाजों के बीच से कैसे वहां स्थापित हुआ ये अपने आप मे आज भी रहस्यमयी बना हुआ है। फिलहाल शिवलिंग के स्थापित हो जाने के बाद से यहां भक्तों का प्रत्येक सोमवार और सावन के खास मौके पर तांता लगा रहता है। और सच्चे मन से जो भक्त यहां आता है उसकी मनोकामना बाबा जरूर पूरी करते हैं।

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