DN Exclusive: सरकारें क्यों कर रही मनमानी? सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद भी क्यों चल रहा अवैध बुल्डोजर? जानिये गाइडलाइंस

डीएन ब्यूरो

6 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने बुल्डोजर कार्रवाई को लेकर ऐतिहासिक फैसला दिया था और बुल्डोजर कार्रवाई को लेकर एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की थी। इस मामले पर पढ़िये डाइनामाइट न्यूज़ की पूरी पड़ताल

बुलडोजर एक्शन पर बड़ा फैसला
बुलडोजर एक्शन पर बड़ा फैसला


नई दिल्ली: अभी तक बुलडोजर कार्रवाई के अधिकतर मामले उत्तर प्रदेश से सामने आते रहे हैं लेकिन अब बुलडोजर यूपी से देश के कई राज्यों में पहुंच चुका है। खासकर भाजपा शासित राज्यों में बुलडोजर एक्शन आम हो चला है। सत्ता परिवर्तन के बाद अब महाराष्ट्र से भी ऐसी खबरें है। 

बुल्डोजर एक्शन

औरंगजेब की कब्र हटाने को लेकर हुए प्रदर्शन के बीच नागपुर में हिंसा के मास्टरमाइंड फहीम खान के खिलाफ भी देवेंद्र फडणवीस सरकार ने सोमवार सुबह बुल्डोजर एक्शन की कार्रवाई की है। पुलिस ने फहीम के दो मंजिला मकान का अगला हिस्सा ढहा दिया गया। नगर निगम ने फहीम के परिवार के अवैध कब्जा हटाने का 24 घंटे का नोटिस दिया था। मियाद पूरी होने के बाद नगर निगम की टीम ने कब्जे पर बुलडोजर चलाया। हालांकि हाईकोर्ट ने सोमवार शाम को सरकार के इस फैसले पर रोक लगा दी। लेकिन सवाल ये है कि आखिर सरकारें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को पालन क्यों नहीं कर रही है।

शीर्ष अदालत की नाराजगी

दूसरी तरफ महाराष्ट्र के ही सिंधुदुर्ग जिले में एक आरोपी के घर और दुकान पर बुलडोजर एक्शन अमल में लाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ही महाराष्ट्र सरकार और वहां की लोकल अथॉरिटीज को नोटिस जारी कर दिया है और बुलडोडर एक्शन पर कड़ी फटकार लगाते हुए चार हफ्ते में जवाब देने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने बुल्डोजर कार्रवाई को लेकर शीर्ष अदालत के आदेश व गाइडलाइन का पालन न करने पर नाराजगी जतायी है।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

डाइनामाइट न्यूज़ की इस रिपोर्ट में जानिये आखिर बुलडोजर कार्रवाई पर क्या है सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और क्या गाइडलाइन जारी की है सुप्रीम कोर्ट ने, जिसका बार सरकारें उल्लंघन कर रही है। अधिकारी उल्लंघन कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि किया सरकार और शासन सुप्रीम कोर्ट से ऊपर है। ये मुद्दा न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका में एक तरह का नया टकराव बनता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट आदेश जारी करता है और सरकारें उसका पालन नहीं करती। शीर्ष अदालत की गाइडलाइन और ऐतिहासिक फैसले से पहले हम उस मामले को समझने की कोशिश करते हैं, जिसके लिये महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया गया है।

अधिकारियों द्वारा तोड़फोड़

दरअसल, पिछले महीने भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गये चैंपियंस ट्रॉफी के मैच के दौरान कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाये गये थे। नारे लगाने वाले 15 वर्षीय एक किशोर के बारे में एक शिकायत दर्ज की गई थी, जिसके बाद अधिकारियों द्वारा तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई थी। अधिकारियों ने बुलडोजर कार्रवाई करते दो कबाड़ की दुकानों को तोड़ दिया था। दुकान के मालिकों को नटिस भी नहीं दिया गया। इनमें से एक दुकान आरोपी किशोर के पिता की थी और दूसरी उसके चाचा की।

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फैसले का उल्लंघन करने का आरोप

इस कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 नवंबर, 2024 को दिये गये फैसले का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और स्थानीय अथॉरिटी को नोटिस जारी कर चार सप्ताह मे जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। साथ ही अगले 15 दिनों तक कोई कार्रवाई न करने का भी आदेश दिया। 

वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश की याचिका

दरअसल, 13 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले मे कहा था कि सिर्फ इसलिए घर नहीं गिराया जा सकता क्योंकि कोई व्यक्ति आरोपी है। सुप्रीमम कोर्ट ने ये भी कहा कि राज्य आरोपी या दोषी के खिलाफ मनमानी कार्रवाई नहीं कर सकता है। अदालत ने अफसरों को मनमनी और सत्ता का दुरुपयोग करने  पर कड़ी फटकार भी लगाई थी।13 नवंबर से पहले सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2024 को देश के वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश की एक पत्र याचिका पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाय़ा था।

सीजेआई का बड़ा आदेश

ये लैंडमार्क जजमेंट भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीष डाक्टर डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने तब सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर धव्स्तीकरण के मामले में एक तय गाइलाइन का पालन करने को कहा था। इसके साथ ही यूपी सरकार को मनोज टिबड़ेवाल आकाश को 25 लाख का दंडात्मक मुआवजा देने का भी आदेश दिया और इसके साथ ही दोषी अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश भी जारी किया। मनोज टिबड़ेवाल आकाश की याचिका पर आये इस फैसले के आधार पर यूपी के आईएएस-आईपीए समेत 26 अफसरों और कर्मचारियों के खिलाफ 30 दिसंबर 2024 को एफआईआर दर्ज की गई।

मनोज टिबड़ेवाल आकाश मामला

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आज यानि सोमवार को जो आदेश दिया गया है, वो भी इसी पिछले मनोज टिबड़ेवाल वाली याचिका आदेश के आधार पर है। सुप्रीम कोर्ट ने तब क्या गाइडलाइन जारी की, इससे पहले हम आपको बताएंगे कि वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश का मामला आखिर क्या था?

मकान को अवैध तरीके से ढ़हाया

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इस मामले यानि कहानी की शुरूआत लगभग साढ़े 5 साल पहले उत्तर प्रदेश के महराजगंज जनपद से शुरू होती है। 13 सितंबर 2019 को वरिष्ठ पत्रकार मनोज टिबड़ेवाल आकाश के पैतृक मकान को बुलडोजरों से बिना विधिक प्रक्रिया के गिराया गया था। जबकि उनका मकान पूरी तरह वैध जमीन पर बना था, जिसके खिलाफ मनोज टिबड़ेवाल आकाश ने सुप्रीम कोर्ट में एक लेटर पेटिशन दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट के अलावा मनोज ने इस मामले में मानवाधिकार आयोग समेत कई विभागों से शिकायत की। मनोज की शिकायत पर मानवाधिकार आयोग के आदेश के बाद सरकार की जांच में बस्ती के तत्कालीन कमीश्नर ने भी माना की मनोज टिबड़ेवाल के मकान को अवैध तरीके से ढ़हाया गया और इसके लिये महराजगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी को दोषी पाया। 

सुप्रीम कोर्ट ने ये ऐतिहासिक फैसला

राष्ट्रीय मानवाधिकार की रिपोर्ट समेत तमाम जांच नतीजों के आधार सुप्रीम कोर्ट ने ये ऐतिहासिक फैसला सुनाया और ध्वस्तीकरण को लेकर एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की और सभी राज्यों समेत केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को इस गाइडलाइन का पालन करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने जो गाइडलाइन जारी की, उसमें मुख्य रूप से कहा गया कि बिना नोटिस या समय दिये बिना किसी का मकान सिर्फ मुनादी करावकर नहीं गिराया जा सकता।

ध्वस्तीकरण की वीडियोग्राफी

याची को स्पीड पोस्ट या डाक द्वारा लिखित नोटिस जारी किया जाना चाहिये। नोटिस को निर्माण पर भी चिपकाया जाना चाहिये। उसे नोटिस का जवाब देने के लिये 15 दिनों का समय दिया जाना चाहिये। ध्वस्तीकरण की वीडियोग्राफी होनी चाहिये। जिलाधिकारी को लिखित तौर पर इसकी सूचना दी जानी चाहिये। ध्वस्तीकरण के आदेश पारित होने के बाद भी, ध्वस्तीकरण के आदेश को चुनौती देने के लिए कुछ समय दिया जाना चाहिए।

कोर्ट के आदेशों का पालन क्यों नहीं

ध्वस्तीकरण की रिपोर्ट नगर आयुक्त को भेजी जानी चाहिए।सुप्रीम कोर्ट द्वारा विस्तार से दिये गये इन दिशा निर्देशों का अब भी जमकर उल्लंघन हो रहा है। सवाल उठ रहा है कि सरकारें और अधिकारी आखिर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं। आखिर ये सब कुछ कब तक चलेगा और यदि कोई दोषी है तो क्यों नहीं उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है।










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