महराजगंज नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव: आरक्षण ने बिगाड़े कई प्रमुख दावेदारों के समीकरण

शिवेंद्र चतुर्वेदी

महराजगंज नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव में आरक्षण ने कई प्रमुख दावेदारों के समीकरण को बिगाड़ कर रख दिया है। दो प्रभावित दावेदारों ने आरक्षण के बाबत आपत्ति शासन के समक्ष दाखिल कर दी है। एक दावेदार ने डाइनामाइट न्यूज़ को बताया कि उसने कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है और दीपावली के बाद कोर्ट खुलने पर वे न्यायपालिका की चौखट पर गुहार लगायेंगे।

नगर पालिका परिषद, महराजगंज का कार्यालय
नगर पालिका परिषद, महराजगंज का कार्यालय

महराजगंज: लगातार 20 साल तक निकाय चुनाव में सदर की सीट अनुसूचित रहने के बाद इस बार पिछड़ा वर्ग के लिए शासन ने आरक्षित की है। इससे कईयों के चेहरे खिल उठे हैं तो कईयों के समीकरण पूरी तरह धवस्त हो गये हैं। क्या रहेगा इस बार सदर की सीट पर समीकरण इसी की पड़ताल कर रही है डाइनामाइट न्यूज़ की ये रिपोर्ट।

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क्या है नगर पालिका का इतिहास
बात 1986 की है। कांग्रेस जब सूबे में अवसान पर थी तब कांग्रेस के पूर्व सांसद जितेन्द्र सिंह की सिफारिश पर मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने नगर पंचायत बनाये बिना ही महराजगंज को नगर पालिका का दर्जा दे दिया। यह अपने आप में बेहद अनोखा लेकिन महराजगंज के ल िए बहुत बड़ी बात थी। इससे पहले यह नगर ग्राम सभा का रुप लिये हुए था और इसे चिउरहा मऊपाकड़ के नाम से जाना जाता था।

समीकरण आरक्षण का
जहां तक आरक्षण की बात है तो सबसे ज्यादा घाटे में सवर्ण प्रत्याशी रहे हैं औऱ सबसे ज्यादा फायदे में अनुसूचित जाति के। इतिहास के झरोखें में देंखे तो महराजगंज में पहला चुनाव 1987 में हुआ तब यह सवर्ण सीट थी। इसके बाद 1995, 2000, 2006 और 2012 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई। लगातार 4 बार अनुसूचित जाति के लिए सीट आरक्षित रहने के बाद इस बार यह सीट 2017 के चुनाव में पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित की गयी है।

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कौन-कौन रहा अध्यक्ष
1987 के पहले चुनाव में महराजगंज के नगर पालिका अध्यक्ष बने कांग्रेस के टिकट पर रमाकांत प्रसाद। तब यह चुनाव जिले के इतिहास का सबसे ज्यादा बवाल वाला चुनाव साबित हुआ। जमकर लाठीचार्ज हुई और जबरदस्त हंगामे के बाद किसी तरह यह चुनाव सम्पन्न हुआ। इसके बाद 1995 में अनुसूचित कोटे में भाजपा प्रत्याशी के रुप में कस्बे के जयमंगल कन्नौजिया ने टिकट हासिल की और जीत भी दर्ज की। यह चुनाव भी खासा रोचक हुआ था और जयमंगल उर्फ पुल्लु ने अपने दम पर यह टिकट हासिल की। वजह थी भाजपा नेतृत्व हुकुम चंद्र खरवार को टिकट देना चाह रहा था लेकिन पुल्लु ने भाजपा नेतृत्व से मोर्चा लेते हुए यह टिकट हासिल की। इसके बाद 2000 के चुनाव में एक बार फिर भाजपा नेतृत्व ने जयमंगल की टिकट काट दी। इसके बाद जयमंगल ने अपनी पत्नी सुनीता कन्नौजिया को निर्दल टोकरी चुनाव चिन्ह से मैदान में उतार दिया और जीत भी दर्ज की। 2006 में एक बार फिर यह सीट भाजपा के खाते में आ गयी। अनुसूचित जाति के रामजगत प्रसाद ने इस सीट पर कब्जा जमाया। 2012 में अध्यक्ष पद पर रीता भारती कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतीं। ये कांग्रेस नेता चंद्रजीत भारती की पत्नी हैं।

किस्मत ने बिगाड़ा खेल
आरक्षण सामान्य न होने की वजह से कई राजनीतिक दलों भाजपा, सपा, बसपा व कांग्रेस के नेताओं के अलावा 4 से 5 प्रमुख निर्दलियों के मंसूबे पर पानी फिर गया है। 

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