Holi Special: आखिर क्यों मनाई जाती है होली, जानें

डीएन ब्यूरो

होली का नाम सुनते ही मन में खुशी और उल्लास की भावना उत्पन्न हो जाती है। इस त्योहार को बच्चे से लेकर बूढ़े तक बड़े धूमधाम के साथ मनाते हैं। यह हिंदुओं का प्रमुख और प्रचलित पर्व है। डाइनामाइट न्यूज़ की इस रिपोर्ट में पढ़ें क्यों मनाया जाता है होली का त्योहार और क्या है इसका इतिहास..

होली के रंग में रंगे लोग (फाइल फोटो)
होली के रंग में रंगे लोग (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: भारत त्यौहारों का देश है। पूरे साल कई बड़े त्यौहार देशवासी उत्साह और धूमधाम के साथ मनाते है। उन्हीं में से एक होली का त्यौहार है।  होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक हिंदुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार फाल्गुन महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। होली उन त्यौहारों में से है जिसका लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है। इस दिन लोग एक-दूसरे के गुलाल लगाते हैं और मिठाई खाकर इस त्यौहार को मनाते हैं।

डाइनामाइट न्यूज़ की इस रिपोर्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं कि क्यों मनाया जाता है होली का त्योहार और क्या है इसके पीछे की मान्यता। 

होली का त्यौहार होली के इतिहास से जुड़ा है। प्राचीन भारत में एक राजा हुआ करता था। जिसका नाम हिरण्यकश्यप था। हिरण्यकश्यप एक राक्षस के सामान था। उसका एक छोटा भाई था जिसका वध भगवान् विष्णु ने कर दिया था। वह अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता था। इसलिए उसने ताकत पाने के लिए घोर तपस्या की और उस तपस्या का फल उसे  एक वरदान मिला। लेकिन वह इस वरदान की वजह से खुद को भगवान् मानने लगा था।  जितनी भी प्रजा थी उन सबसे वह अपनी पूजा करवाता था।

हिरण्यकश्यप का एक बेटा भी था। जिसका नाम प्रहलाद था। प्रहलाद भगवान् बिष्णु का भक्त था। वह भगवान् बिष्णु की रात दिन पूजा करता था। उसने अपने पिता हिरण्यकश्यप की कभी पूजा नहीं की। राक्षस प्रवृत्ति वाला हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद की भगवान के प्रति भक्ति को देखकर बहुत परेशान था। उसने प्रह्लाद का ध्यान ईश्वर से हटाने के लिए हर संभव कोशिश की लेकिन उसे इसमें सफलता नहीं मिली।

बेटे द्वारा अपनी पूजा ना करने से नाराज उस राजा ने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया। उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए क्योंकि होलिका आग में जल नहीं सकती थी। उनकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी, लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि प्रहलाद सारा समय भगवान विष्णु का नाम लेता रहा और बच गया पर होलिका जलकर राख हो गई। बाद में भगवान् विष्णु ने नृसिंह का अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया था। इस तरह होलिका के दहन से बुराई पर अच्छाई की जीत हुई। 








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