Trump Tariffs: ट्रंप टैरिफ से निपटने में भारत की कितनी तैयारी? जानिए इस चुनौती से कैसे निपटेगा देश
भारत के लिए ट्रंप के टैरिफ नीति ने जहां कुछ क्षेत्रों में नुकसान उठाने की स्थिति पैदा की, वहीं कई नए मौके भी उत्पन्न हुए हैं लेकिन इससे भारत को क्या फायदा या नुकसान होने वाला है, यह जानने के लिए पढ़िए डाइनामाइट न्यूज की ये खास रिपोर्ट

नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में व्यापारिक युद्ध और टैरिफ (आयात शुल्क) का मुद्दा वैश्विक व्यापार जगत में सुर्खियों में रहा। 2018 से 2020 तक ट्रंप ने चीन समेत कई देशों के खिलाफ व्यापार युद्ध की शुरुआत की।
डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के अनुसार, जिसमें भारत भी कुछ हद तक प्रभावित हुआ। उनके द्वारा लगाए गए टैरिफ के कारण भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा, जबकि कुछ मामलों में भारत के लिए नए मौके भी पैदा हुए।
अमेरिका का टैरिफ नीति
अमेरिका के राष्ट्रपति ने हाल ही में एक कार्यकारी आदेश जारी किया है। जिसमें व्यापारिक साझेदारों से आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की घोषणा की गई है। इस आदेश के अनुसार अमेरिका ने भारत पर 27 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ लागू किया है, जो 5 अप्रैल, 2025 से प्रभावी होगा। इसके अतिरिक्त अमेरिका ने अन्य देशों पर भी 10% से लेकर 50% तक के शुल्क लगाने की योजना बनाई है। जिसमें हर देश के लिए शुल्क दर अलग-अलग होगी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, 10 प्रतिशत का आधारभूत शुल्क 5 अप्रैल, 2025 से लागू होगा जबकि बाकी देश-विशिष्ट अतिरिक्त शुल्क 9 अप्रैल, 2025 से लागू होंगे। अमेरिका का यह कदम कई देशों के व्यापारिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है, और इसके प्रभाव को लेकर हर देश में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
भारत पर प्रभाव का आकलन
केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने अमेरिका द्वारा लगाए गए इस नए टैरिफ का बारीकी से अध्ययन करना शुरू कर दिया है। मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि यह विश्लेषण किया जा रहा है कि यह शुल्क भारतीय निर्यात क्षेत्र पर किस तरह से असर डालेगा। मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि वे भारतीय उद्योग और निर्यातकों से फीडबैक ले रहे हैं और इस शुल्क के प्रभाव को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
बयान में यह भी कहा गया है कि वाणिज्य मंत्रालय अमेरिका द्वारा लागू किए गए इस टैरिफ के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा रहा है और इसके बाद इस पर रणनीतिक कदम उठाए जाएंगे। मंत्रालय का यह भी कहना है कि वे इस नई स्थिति से उत्पन्न होने वाले संभावित अवसरों का भी अध्ययन कर रहे हैं।
भारत-अमेरिका के बीच चल रही बातचीत
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में इस समय कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं।
13 फरवरी को दोनों नेताओं ने "मिशन 500" की घोषणा की थी, जिसका लक्ष्य 2030 तक भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 500 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाना है। इसके तहत दोनों देशों के व्यापार टीमों के बीच निरंतर बातचीत चल रही है, जिसमें पारस्परिक रूप से लाभकारी और बहु-क्षेत्रीय द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर जोर दिया जा रहा है।
यह भी पढ़ें |
Trump Tariffs: डोनाल्ड ट्रंप के इस ऐलान ने किया करोड़ों रुपये का नुकसान, जानिए भारत पर क्या पड़ा असर
भारत के लिए नुकसान या फायदा?
ट्रंप प्रशासन ने भारत से आने वाली कई प्रमुख वस्तुओं जैसे स्टील, एल्यूमिनियम और अन्य उत्पादों पर टैरिफ बढ़ा दिया था। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में अपने उत्पादों को बेचने की लागत बढ़ गई, जिससे उनका मुनाफा घटा और प्रतिस्पर्धा में गिरावट आई।
खास उत्पादों पर प्रतिबंध
कुछ भारतीय उत्पाद, जैसे कि चिकित्सा उपकरण, फर्नीचर और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, ट्रंप प्रशासन के तहत व्यापार प्रतिबंधों के दायरे में आए। इन उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार में पहुंच घटने से भारतीय उद्योगों को नुकसान हुआ।
संभावित व्यापार संतुलन में असंतुलन
अमेरिका-भारत व्यापार में असंतुलन बढ़ा, जहां भारत का व्यापारिक घाटा और अधिक हो गया। ट्रंप के टैरिफ नीति के कारण भारतीय उत्पादों की कीमतें बढ़ गईं, जिससे व्यापार असंतुलन को बढ़ावा मिला।
भारत के लिए मौके
ट्रंप के व्यापार युद्ध और चीन पर लगाए गए टैरिफ के कारण कई अमेरिकी कंपनियों ने चीन से उत्पादन को भारत और अन्य देशों में स्थानांतरित करना शुरू किया। इससे भारत को उत्पादन और निवेश के रूप में नए मौके मिले, खासकर टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और वाहन निर्माण क्षेत्र में।
द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में अवसर
ट्रंप प्रशासन के तहत भारत ने कई द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर बातचीत की। भारत ने अमेरिकी व्यापारियों और निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कई नीतियां बनाई, जिनका उद्देश्य अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ाना था। इससे भारतीय कंपनियों को न केवल नए बाजार मिलें, बल्कि अमेरिका में निवेश भी बढ़ा।
सेवा क्षेत्र का विस्तार
यह भी पढ़ें |
US Tariffs on India: ट्रंप का बड़ा कदम! भारत पर लगाए जाने वाले आयात शुल्क को किया कम; जानिये कितना हुआ
अमेरिका में भारतीय सेवा उद्योग, विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और अन्य तकनीकी सेवाएं, पहले से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। ट्रंप प्रशासन के दौरान भी भारतीय IT कंपनियों ने अमेरिका में कई नई परियोजनाओं को लेकर विस्तार किया। इसके अलावा, भारत को चिकित्सा, शिक्षा और अन्य पेशेवर सेवाओं के क्षेत्र में भी अवसर मिले।
रूपये की स्थिरता और प्रतिस्पर्धा
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपेक्षाकृत स्थिर रहा, जो भारतीय निर्यातकों को फायदा पहुंचा। भारतीय उत्पादों की कीमतों में अपेक्षाकृत स्थिरता रही, जिससे कुछ उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी और आयात शुल्क का असर कुछ कम हुआ।
भारत की तैयारी
भारत ने अमेरिकी टैरिफ के असर को कम करने के लिए अपने व्यापारिक ढांचे में सुधार किया है। सरकार ने निर्यातकों के लिए सब्सिडी और प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की हैं, साथ ही विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए नीतियां बनाई हैं।
विकसित देशों के साथ व्यापार समझौते
भारत ने अन्य विकसित देशों जैसे यूरोपीय संघ, जापान, और ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापार समझौतों को तेज़ी से पूरा किया। इसके अलावा, भारत ने अमेरिकी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए कई नए व्यापारिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया है, जैसे रक्षा, ऊर्जा और हेल्थकेयर।
निर्यात के लिए नए बाजार
भारत ने अपने निर्यात को अमेरिकी बाजार के अलावा अन्य देशों में भी फैलाने की रणनीति बनाई। यूरोपीय और मध्य पूर्व के बाजारों में भारत के उत्पादों की मांग बढ़ाने के लिए कदम उठाए गए हैं।
आधुनिक तकनीक और अनुसंधान में निवेश
भारत ने औद्योगिक और तकनीकी उत्पादों के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश बढ़ाया है, जिससे भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।