Allahabad High Court: वक्ष स्पर्श और दुष्कर्म संबंधी फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया, जानिये क्या बोलींरेखा शर्मा
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के फैसले की देशभर में चर्चा हो रही है। महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा है कि महिला आयोग को इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए। पढ़िए डाइनामाइट न्यूज़ की पूरी रिपोर्ट

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश द्वारा यह फैसला सुनाया गया कि नाबालिग के वक्ष का स्पर्श और उसके वस्त्र का नाड़ा तोड़ना दुष्कर्म का अपराध नहीं है, जिसके बाद राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। रेखा शर्मा का कहना है कि यह फैसला गलत है।
रेखा शर्मा ने न्यायाधीश के फैसले को बताया गलत
डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के अनुसार, रेखा शर्मा ने कहा कि यह फैसला पूरी तरह से गलत है। यदि न्यायाधीश संवेदनशील नहीं होते हैं, तो महिलाएं और बच्चे अपने अधिकारों की रक्षा किससे करेंगे?”
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीशों को इस तरह के मामलों में आरोपियों की मंशा को समझना चाहिए और केवल शारीरिक कृत्य को आधार नहीं बनाना चाहिए।
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लोगों ने की फैसले की निंदा
इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई लोग इस फैसले को निंदनीय मान रहे हैं और न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठा रहे हैं। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि कोर्ट ने कानून के तहत तकनीकी दृष्टिकोण से फैसला लिया है, जबकि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
मामले की शुरुआत
इस मामले की शुरुआत कासगंज में हुए एक गंभीर यौन उत्पीड़न मामले से हुई, जिसमें 11 साल की बच्ची के साथ जघन्य अपराध का आरोप लगाया गया था। आरोप था कि तीन आरोपियों ने पीड़िता के स्तन को पकड़ा, उसकी नाल तोड़ी और उसके साथ बेरहमी से मारपीट करने की कोशिश की, हालांकि, राहगीरों के हस्तक्षेप के बाद वे भाग गए।
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इस घटना के बाद कासगंज पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) और पॉक्सो एक्ट की धारा 18 के तहत मामला दर्ज किया, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच, जिसमें जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा शामिल थे, ने माना कि इस घटना में बलात्कार का अपराध नहीं बनता।
अदालत ने इसे गंभीर यौन उत्पीड़न माना और आरोपी के खिलाफ POCSO अधिनियम की धारा 354-बी (नंगा करने के इरादे से हमला) और धारा 9/10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में जारी किया गया समन कानूनी नहीं है, इसलिए इसे संशोधित करने का निर्देश दिया।