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नई दिल्ली: अनादिकाल से भारतीय संस्कृति में घर-परिवारों में क्वारंटीन होते रहे हैं। शिशु जन्म पर 10 दिन का क्वारंटीन (स्यावड़) और परिवार में किसी की मृत्यु होने पर 12 दिन का क्वारंटीन (सूतक) आज भी परम्परागत परिवारों के प्रचलन में हैं। शिशु को जन्म देने वाली माता के शरीर से भी लगभग 10 दिन तक दूषित रक्त का प्रवाह और मृतक शव में जीवाणु होते है इसलिए प्रसूता को नवजात शिशु के साथ अलग कक्ष में रखने की व्यवस्था और शवयात्रा में सम्मिलित होने वाले घर के बाहर ही स्नान करके घर में प्रवेश करें जैसे नियम बनाएं गए थे।
वर्तमान में भी उपरोक्त एवं निम्नांकित व्यवहार-आचरण एवं रीति-रिवाजों का अनुकरण तमाम परिवारों में देखने को मिलता हैं।
इसी क्रम में नहाने के पानी में नीम के पत्तों का प्रयोग, स्वास्थ्य के लिए व्यायाम एवं योगासन तथा सौंदर्य के लिए हल्दी, चंदन और ग्वारपाठे (ऐलोवीरा) का उबटन, रसोईघर में स्नान के उपरांत प्रवेश करना, धूप-बत्ती-कपूर जलाना, पूर्णिमादि अवसरों पर मंत्रोच्चारण, घंटा-ध्वनि एवं हवन-पाठ करना, किसी भी खाद्य वस्तु को छूने और खाने से पूर्व हाथ धोना, शाकाहारी भोजन, हरी सब्जियों, हल्दी और आँवले का नियमित प्रयोग, गर्म दूध और पानी का सेवन तथा सूर्यास्त से पूर्व भोजन करना, हाथ मिलाने की अपेक्षा हाथ जोड़कर नमस्कार करना तथा जूते-चप्पल घर के बाहर उतारना इत्यादि हमारी संस्कृति और संस्कारों के प्रतीक है जिसका वैज्ञानिक आधार आज सबके सामने है। दुर्भाग्य है कि आज भी अधिकांश आधुनिक सभ्यशिक्षित समाज के लोगों के लिए यह सब पिछड़ापन और दक़ियानूसी सोच है।
आधुनिक युग में जहाँ एक ओर विज्ञान एवं तकनीकी के माध्यम से मनुष्य चाँद पर पहुँचा वहीं दूसरी ओर भौतिकतावाद की अंधी दौड़ ने धीरे-धीरे ‘मानवता को आधुनिकता के नाम पर पैरों तले रौंद दिया’।
कहने की आवश्यकता नहीं कि विश्वव्यापी आपदा ‘कोरोना वायरस’ से अधिक जानलेवा विषाणु विकृत मानसिकता वाले भारतीयों की सोच और कृत्य हैं। प्रतिदिन देश के कोनों से डॉक्टरों, पैराचिकित्सकों, पुलिसवालों, सफाई कर्मचारियों पर तबलीगियों द्वारा जानलेवा हमला, इलाहाबाद के प्रोफेसर द्वारा मानवता के भक्षक जमातियों को छुपाकर रखना, साधुओं की पुलिसवालों के सामने भीड़ द्वारा हत्या, मजदूरों पर पुलिस का लाठीचार्ज कौन सी मानवता है?
राजनैतिक दलों का परस्पर आरोप-प्रत्यारोप, सामाजिक दूरी को ठेंगा दिखाते उनके मांगलिक आयोजन, तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा सांप्रदायिक कार्ड खेलकर भारत की छवि को घूमिल करना तथा कर्तव्यनिष्ठ पुलिस होमगार्ड कर्मचारी को ईमानदारी से ड्यूटी करने के लिए बिहार में सार्वजनिक दंड, ऐसी शर्मसार करने वाली अनगिनत घटनाएँ हैं, जिनसे मन विचलित होता है।
विज्ञान, तकनीकी और अर्थव्यवस्था की दृष्टि से विश्व की महाशक्तियाँ भी ‘कोरोना वायरस’ से त्रस्त हैं। विज्ञान पराजित और वैज्ञानिक निराश, इस अदृश्य मानव-जाति के भक्षक के समक्ष समस्त विश्व लाचार और बेबस नज़र आ रहा है।
प्रत्यक्ष रूप में चिकित्सा का एक मात्र विकल्प सामाजिक दूरी और क्वारंटीन हैं लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर भारतीय संस्कृति और संस्कारों को विश्व-समुदाय द्वारा मौन स्वीकृति प्राप्त हो रही है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में दोहा संख्या 120 और 121 में लिखा है:
“सब कै निंदा जे जड़ करहीं | ते चमगादुर होइ अवतरहीं || 120
सुनहु तात अब मानस रोगा | जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ||
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि | 121 (क)
पीड़हिं संतत जीव कहुं सो किमि लहै समाधि||
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान | 121 (ख)
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान ||
संक्षिप्त में भावार्थ यह है कि पृथ्वी पर पाप एवं निंदा बढ़ने पर चमगादड़ अवतरित होंगे, चारों ओर उनसे संबंधित बीमारियाँ फैलेंगी, मनुष्य मरेंगे और उसकी एकमात्र औषधि प्रभु भजन, दान और समाधि होगी, अर्थात संपूर्ण लॉकडाउन। पाश्चात्य संस्कृति के अनुचर अंधभक्तों के लिए यह एक सबक है। सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति संसार की समस्त शक्तियों और सम्पन्नता से सर्वोपरि है।
(लेखिका प्रो. सरोज व्यास फेयरफील्ड प्रबंधन एवं तकनीकी संस्थान, कापसहेड़ा, नई दिल्ली में डायरेक्टर हैं। डॉ. व्यास संपादक, शिक्षिका, कवियत्री और लेखिका होने के साथ-साथ समाज सेविका के रूप में भी अपनी पहचान रखती है। ये इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के अध्ययन केंद्र की इंचार्ज भी हैं)
Published : 22 April 2020, 5:06 PM IST
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