जाने, होलिका दहन का महत्व और शुभ मुहूर्त

डीएन ब्यूरो

भारत में होली का त्योहार बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। होली के एक दिन पहले होलिका दहन होती है। पढ़ें क्या है होलिका दहन का महत्व और शुभ मुहूर्त ..

होलिका दहन (फाइल फोटो)
होलिका दहन (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: शुक्रवार को पूरे देश में होली का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जायेगा। होली से एक दिन पहले होलिका दहन मनाया जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। 

इस बार होलिका दहन शाम को 7.40 के बाद किया जाएगा। पूर्णिमा के साथ भ्रद्रा भी लग रहे हैं। ऐसी मान्यता है कि भद्रा में होलिका दहन नहीं किया जाता है। भद्रा गुरुवार शाम 6:58 बजे के बाद ही खत्म होगी।इसलिए भद्रा समाप्त होने के बाद होलिका दहन किया जाएगा।  

होलिका दहन के दिन पवित्र अग्नि जलाई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का संकेत है। होलिका दहन के लिए तीन चीजों का एक साथ होना बहुत ही शुभ होता है। पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो और भद्रा ना लगा हो। इस साल होलिका दहन पर ये तीनों संयोग बन रहे हैं। इसलिए इस बार होली शुभ रहेगी। 

 

होलिका दहन का महत्व
होली का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन सभी एक साथ मिलकर होली का त्योहार मनाते हैं। होलिका दहन के पीछे भी एक पुराणिक कथा प्रचलित है।

ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था, वह खुद को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। लेकिन हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर का बहुत बड़ा भक्त था। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भी भगवान की पूजा करने से मना कर दिया था, बावजूद इसके प्रह्लाद ईश्वर की पूजा करता रहा। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप से अपने पुत्र को कई दंड दिये लेकिन इसके बाद भी प्रह्लाद ने ईश्वर की भक्ति करनी नहीं छोड़ी। 

 

हिरण्यकश्यप की एक बहन थी, जिसका नाम होलिका था। होलिका को ईश्वर से यह वरदान मिला था कि उसे अग्नि कभी नहीं जला पाएगी। हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। उसी समय से समाज की बुराइयों को जलाने के लिए होलिकादहन किया जाता है।








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