वाराणसी: मणिकर्णिका घाट पर मसाननाथ की आरती के बाद शुरू हुई चिता भस्म होली, 5 लाख पर्यटक पहुंचे
काशी में मणिकर्णिका घाट पर मसाने की होली का आयोजन हुआ, जिसे 'चिता भस्म होली' कहा जाता है। इस अनोखी परंपरा में चिता की राख से होली खेली जाती है, जो मृत्यु पर विजय का प्रतीक है। इस होली में 5 लाख पर्यटक शामिल हुए, और नागा संन्यासी भी भागी थे। पढ़िए डाइनामाइट न्यूज की रिपोर्ट

वाराणसी: भारत में हर राज्य और शहर में होली का उत्सव अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। काशी की होली विशेष रूप से प्रसिद्ध है, क्योंकि यहां मणिकर्णिका घाट पर एक अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।
मां काली का रौद्र रूप, हर तरफ उड़ती चिता की राख, गले में नरमुंड की माला, मुंह से निकलते आग के गोले और शिव तांडव का वातावरण इसे अन्य होलियों से अलग बनाता है।
यह सब कुछ आज मणिकर्णिका घाट पर देखा गया, जहां मसाने की होली मनाई गई। इस अनोखी होली को देखने के लिए 20 देशों से लगभग 5 लाख पर्यटक काशी पहुंचे थे।
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डाइनामाइट न्यूज संवाददाता के अनुसार, काशी में मसाने की होली मसाननाथ की आरती के बाद करीब 12 बजे खेली गई थी। इस होली में नागा संन्यासियों ने भी भाग लिया। हालांकि, यह पहली बार था जब महिलाओं को इस होली में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई थी।
बनारस की मसान की होली को ‘चिता भस्म होली’ भी कहा जाता है, जो एक प्राचीन और अनोखी परंपरा है। यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है और इसमें मृत्यु को जीवन के एक भाग के रूप में मनाने की भावना निहित है। इसे भगवान शिव के समर्पण के रूप में देखा जाता है, क्योंकि शिव मृत्यु के देवता माने जाते हैं।
काशी की मसान की होली हर साल होली के दिन से पहले मनाई जाती है और यह मृत्यु पर विजय का प्रतीक मानी जाती है।
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने मसान की होली की शुरुआत की थी। कहा जाता है कि रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव ने माता पार्वती का गौना करके उन्हें काशी लाया था, जहां उन्होंने अपने गणों के साथ होली खेली थी लेकिन श्मशान में रहने वाले भूत-प्रेतों के साथ होली न खेल पाने के कारण, उन्होंने श्मशान में रहने वाले जीवों के साथ एक दिन बाद होली खेली थी।
काशी में मसान की होली की परंपरा खास है, क्योंकि यह चिता की राख से होली खेलने की परंपरा से जुड़ी हुई है। यह परंपरा न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। काशी विश्वनाथ मंदिर में होली के समय भक्त चिता की भस्म, अबीर और गुलाल एक-दूसरे पर अर्पित करते हैं, ताकि वे भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। मणिकर्णिका घाट पर हर-हर महादेव के नारे गूंजते हैं, और यह पर्व जीवन और मृत्यु के चक्र को समझने का एक अद्वितीय तरीका है।
शिवपुराण और दुर्गा सप्तशती में भी मसान की होली का वर्णन किया गया है, जो इस परंपरा की धार्मिक महिमा को दर्शाता है।