कैंसर का इम्यून-फ्री इलाज! जापानी वैज्ञानिकों की नई थेरेपी सीधे ट्यूमर को करेगी खत्म; पढ़ें पूरी जानकारी

जापानी वैज्ञानिकों ने AUN बैक्टीरिया थेरेपी विकसित की है जो इम्यून सिस्टम की मदद के बिना कैंसर ट्यूमर को नष्ट कर सकती है। यह थेरेपी आने वाले 6 वर्षों में मरीजों तक पहुंच सकती है, जल्द शुरू होंगे क्लिनिकल ट्रायल।

Post Published By: सौम्या सिंह
Updated : 27 August 2025, 5:54 PM IST

New Delhi: कैंसर के इलाज में अब एक नई क्रांति आने वाली है। जापान के वैज्ञानिकों ने ऐसी थेरेपी विकसित की है जो बिना इम्यून सिस्टम पर निर्भर हुए सीधे ट्यूमर को खत्म करने की क्षमता रखती है। जापान एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (JAIST) के शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को AUN बैक्टीरिया थेरेपी नाम दिया है। यह न सिर्फ एक नई उम्मीद है, बल्कि उन लाखों मरीजों के लिए वरदान साबित हो सकती है जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है या जो पारंपरिक इम्यूनोथैरेपी से लाभ नहीं उठा पाते।

150 साल पुराने प्रयोग से नई खोज तक

AUN थेरेपी का आधार 19वीं सदी के अंत में डॉक्टर विलियम कोली द्वारा किए गए प्रयोगों पर है, जब उन्होंने बैक्टीरिया का इस्तेमाल कर ट्यूमर को खत्म करने की कोशिश की थी। हालांकि, उनकी तकनीक इम्यून सिस्टम पर निर्भर थी, जो कई मरीजों के लिए प्रभावी नहीं थी। वैज्ञानिकों ने अब उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए एक ऐसी थेरेपी बनाई है जो पूरी तरह इम्यून-इंडिपेंडेंट है।

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AUN थेरेपी कैसे करती है काम?

AUN थेरेपी दो अलग-अलग प्रकार के बैक्टीरिया के मेल से तैयार की गई है-

A-gyo बैक्टीरिया: यह ट्यूमर तक पहुंचता है और वहां की कैंसर कोशिकाओं और उनकी रक्त वाहिकाओं को नष्ट करता है।

UN-gyo बैक्टीरिया: यह A-gyo की गतिविधियों को कंट्रोल करता है ताकि संक्रमण सिर्फ ट्यूमर तक सीमित रहे।

जापानी वैज्ञानिकों ने AUN बैक्टीरिया थेरेपी विकसित की

इंजेक्शन के समय 3% A-gyo और 97% UN-gyo का अनुपात होता है। लेकिन जैसे ही यह ट्यूमर के अंदर प्रवेश करता है, अनुपात 99% A-gyo और 1% UN-gyo हो जाता है। यह बदलाव ट्यूमर को तेजी से नष्ट करता है और साइड इफेक्ट्स को भी नियंत्रित रखता है।

इम्यूनोथैरेपी से कैसे है अलग?

मौजूदा इम्यूनोथैरेपी जैसे CAR-T या चेकपॉइंट इनहिबिटर्स तभी काम करती हैं जब मरीज का इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। इसके उलट, AUN थेरेपी उन मरीजों के लिए भी असरदार है जिनका इम्यून सिस्टम बेहद कमजोर होता है।

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इस थेरेपी के शुरुआती प्रयोगों में न तो गंभीर साइड इफेक्ट्स दिखे और न ही साइटोकाइन रिलीज सिंड्रोम जैसी जटिलताएं देखी गईं। यह दर्शाता है कि बैक्टीरिया का नियंत्रण अच्छी तरह से किया गया है।

आगे क्या है योजना?

इस रिसर्च का नेतृत्व प्रोफेसर एजीरो मियाको कर रहे हैं। वे बताते हैं कि जल्द ही इसका क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया जाएगा। वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि अगले 6 वर्षों में यह थेरेपी मरीजों तक पहुंच सके। इसके लिए एक स्टार्टअप लॉन्च करने की भी तैयारी है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार चला, तो यह थेरेपी कैंसर के इलाज में एक नई क्रांति बन सकती है, जो इलाज की सीमाओं को नए स्तर पर ले जाएगी।

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  • New Delhi

Published : 
  • 27 August 2025, 5:54 PM IST